Saturday, 17 June 2017

क्यों भारत की सेना ‘सेक्युलर’ नहीं होनी चाहिए

क्यों भारत की सेना ‘सेक्युलर’ नहीं होनी चाहिए

भारतीय सेना के विषय में गौरवान्वित करने वाले तथ्यों में से एक बहुचर्चित बात यह कही जाती है कि वह ‘सेक्युलर’ है तथा सम्प्रदाय/मज़हब से उसका कोई वास्ता नहीं। पर क्या यह बात आवश्यक हो कि ठीक ही है? प्रश्न यह है, कि, क्या मज़हब तथा सेना के संयोजन का राष्ट्र की सुरक्षा से कोई सम्बन्ध है? धर्म अथवा मज़हब किसी भी देश की एकता के पीछे के प्रमुखतम कारणों में से होते हैं। भारत के उत्तर-पूर्व से लेकर कश्मीर तक, कोई भी वह क्षेत्र जहाँ हिन्दू अल्पसंख्या में हैं, अलगाववाद से ग्रसित है| यह एक कटु सत्य है तथा इसे केवल आंकड़ों में अपसामान्यता भर समझकर नकारा नहीं जा सकता| यदि हैदराबाद भौगोलिक रूप से पाकिस्तान की सीमा से सटा होता, तो यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि आज वह पाकिस्तान का एक और भाग होता, केवल अपने शासक के मज़हब के कारण| भारत के सेक्युलर अयतुल्लाह किन्चित-मात्र तर्क-बोध के बिना कहा करते हैं कि चूँकि इन्डिया एक सेक्युलर देश है, इसलिए यहाँ की सेना को भी सेक्युलर होना चाहिए; कि उसे मज़हब के आधार पर भेदभाव किये बिना मुसलमानों को अपनी टुकड़ियों में भर्ती करना चाहिए (वह भी तब जब हमारा प्रमुख दुश्मन देश एक मुस्लिम-बाहुल्य देश है जो स्वयं को इस्लाम के ठेकेदार की तरह विश्व के सम्मुख पेश करता रहता है)| यहाँ प्रश्न यह भी है, कि क्या सेना को अपनी कथित सेक्युलर पालिसी को जारी रखते हुए मुस्लिमों को अपनी उच्च श्रेणियों में जगह देनी चाहिए?! इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हमें इतिहास में मुस्लिम विश्वासघात की (दु:)घटनाओं पर दृष्टि डालनी होगी, उन स्थितियों में जहाँ वो मुस्लिम दुश्मनों की सेनाओं के विरुद्ध लड़ रहे थे, ऐसी सेनाओं में रहते हुए जो स्वयं मुस्लिम-साम्राज्यों की नहीं थीं|

सोवियत संघ से प्रमाण

लेख के परिप्रेक्ष्य में मुस्लिम व्यवहार को समझने के लिए सोवियत संघ विचार-विषय के लिए एक अप्रतिम उदाहरण है, विशेषतः एक सेक्युलर तथा नास्तिक समाज रहे होने के कारण भी| सोवियत सरकार मस्जिदों की कड़ी निगरानी रखा करती थी, तथा अपने नौकरशाहों को मस्जिदों के संचालन पर नज़र बनाये रखने का प्रभार भी दे रखा था, यह सुनिश्चित करने के लिए कि वहाँ के मुस्लिम बच्चों को एक सेक्युलर शिक्षा मिलती रहे तथा वे सदैव सोवियत संघ के हितों को सर्वोपरि रखें, न कि अपने मज़हब के| परन्तु, इतने कड़े प्रयासों के बावजूद, यह सेक्युलरीकरण ढह गया, जैसे ही वे सोवियत-अफगान लड़ाई में जा घुसे, तथा बड़ी संख्या में उन्हें अपने मुस्लिम सैनिकों का विश्वासघात झेलना पड़ा|

लड़ाई के शुरू में, सोवियत हाईकमान ने अपनी मध्य-एशियाई मुस्लिम टुकड़ियों पर काफी भरोसा करते हुए उन्हें अफगानिस्तान में तैनात किया वहाँ अपने वामपंथी मित्रों के सहायतार्थ, ताकि वे सोवियत तथा अफगान सैनिकों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित कर सकें जिहादियों के विरुद्ध इस लड़ाई में (भाषाई घनिष्टता के कारण)| यह सोवियतों की एक बड़ी भूल साबित हुयी, कारण कि युद्ध आरम्भ होते ही उन्हें अपने मुस्लिम सिपाहियों के धोखे का सामना करना पड़ा| इन टुकड़ियों में अक्षमता इतनी अधिक थी, कि सोवियत संघ को युद्ध शुरू होने के मात्र तीन माह के भीतर ही इन्हें वापस बुलाने को बाध्य होना पड़ा, तथा इनकी जगह स्लाव मूल के सैनिकों को भेजना पड़ा|

मुस्लिम सिपाहियों से खतरा तीन स्तरों पर था – उनमें से कुछ स्थानीय लोगों से जा मिले, तथा बाकि लड़ने के इच्छुक नहीं थे, और कुछ तो खुलेआम बगावत करते हुए जिहादियों के टुकड़ियों में शामिल हो गए| कुछ आँकड़ों के अनुसार, सोवियत सेना से इनके भाग जाने की दर लगभग ६० से ८० प्रतिशत तक थी युद्ध के प्रथम वर्ष में| अब चूँकि सोवियत सेना को इन मध्य-एशियाई टुकड़ियों को वापस बुलाकर अपने युरोपीय टुकड़ियों को भेजना पड़ गया, तो उनका आकर काफी प्रभावित हुआ तथा इस युद्ध में इस तथ्य की एक निर्णायक भूमिका रही| हाँलाकि इन मध्य-एशियाई सिपाहियों का युद्ध के मैदान में वार्ताकारों के रूप में एक अहम् कार्य था, अपितु शुरू के अपसरण के चलते उन्हें उन्हें मिश्रित टुकड़ियों में ही फिर शामिल किया गया तथा जवाबी कार्रवाईयों इनकी भूमिका बहुत छोटी रही| पश्च दृष्टी में देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सोवियतों ने कुछ कड़े सबक सीखे|

मध्यकालीन भारत से प्रमाण

जब इस्लामी ताकतें समूचे भारत में कोहराम मचाये हुए थीं, तब दक्षिण का शक्तिशाली विजयनगर साम्राज्य अपनी हिन्दू जड़ों से पूर्णतः जुड़ा रहा| इस साम्राज्य के हिन्दू राजा अपनी प्रजा में हर किसी से समभाव रखा करते थे, तथा धर्म-मज़हब के आधार पर किसी से भेदभाव नहीं किया जाता था| यहाँ तक कि विजयनगर की सेना में मुस्लिम सिपाहियों को भी शामिल किया गया था| परन्तु उन्हें उस वेला क्रूर अचम्भे का शिकार होना पड़ा, जब दक्खन सल्तनत के विरुद्ध तलिकोटा कि लड़ाई में उन्हें युद्ध के एक महत्त्वपूर्ण क्षण अपने मुस्लिम सिपाहियों का विद्रोह देखना पड़ा! वह युद्ध जो अब तक विजयनगर को जीत की ओर ले जा रहा था, इस घटना के कारण वह अब दुश्मनों कि झोली में जा बैठा, और विजयनगर साम्राज्य दुश्मन के हाथ आ गया| कारण?! विजयनगर की पीठ में में अपने ही मुस्लिम सेनापतियों तथा सिपाहियों द्वारा छुरा घोंपा जाना!

इस वाक्ये में सबसे अहम् भूमिका रही, गिलानी भाइयों की, जो कि विजयनगर की सेना में सेनापति थे| लड़ाई के अहम् चरण में सेना के मुस्लिम अधिकारियों ने अपनी ही सेना पर पीछे से धावा बोल दिया! अचानक ही राजा राम राय यह देखकर अवाक् रह गए कि उनकी ही सेना की दो मुस्लिम टुकड़ियाँ उनके ही ख़िलाफ़ हो गईं! इन टुकड़ियों ने पीछे से भीषण प्रहार करते हुए कई तोपों पर कब्ज़ा कर लिया| कई तोप के गोले राजा राम राय के हाथी के बगल आकर गिरे, और वे अपनी सवारी से ऐसे ही एक तोप के गोले से घायल होकर नीचे गिर पड़े| राजा सँभलने का प्रयत्न कर ही रहे थे कि इतने में निज़ाम शाह उनको पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा|

ये मुसलमान सिपाही विजयनगर की सेना के सम्मानित सैनिक थे, जिन्हें बराबरी का दर्जा हासिल था, पर यह भी इन्हें ऐन मौके पर द्रोह करने से न रोक पाया| बस “इस्लाम ख़तरे में है” की एक पुकार ही इनके लिए पर्याप्त थी, अपने ‘काफिर’ हिन्दू राजा के विरुद्ध दुश्मन मुस्लिम सेना से हाथ मिलाने को! इस युद्ध के परिणाम घातक साबित हुए, कारण कि मुस्लिम सेनाओं ने फिर कूच करते हुए विजयनगर साम्राज्य कि राजधानी हम्पी को तहस-नहस कर डाला, और इस वैभवशाली साम्राज्य का यहाँ से पतन प्रारम्भ हो गया!

मुसलमनों पर अपना भरोसा रख छोड़ने की यही भूल फिर दोहराई अगली बार मराठाओं ने, जो कि फिर पानीपत के तीसरे युद्ध में उनकी हार का एक प्रमुख कारण बना| पूर्व की लड़ाइयों में, शुजाउद्दौला के पिता की मराठाओं ने काफी सहायता की थी, तथा वह इस रूप से उनके साथी भी माने जाते थे| परन्तु जब मराठाओं को अफगानों के विरुद्ध शुजाउद्दौला की मदद की दरकार हुयी, तो उसने उनको सहायता देने की बजाय उनकी पीठ में छुरा घोंपते हुए मराठा सेना के आपूर्ति मार्गों पर हमला बोल दिया (ग़द्दारी का यह वाक़या शिया-सुन्नी मतभेद और झगड़े को दुहने के विषय में, जैसा कि कुछ भारतीय राष्ट्रवादी प्रतिपादित करते हैं, एक रोचक विषय-वस्तु बनाता है)| शुजाउद्दौला, जो कि एक शिया था, को कई दफ़ा सुन्नी अफ़गानों और रोहिलाओं के अपने ‘गैर-इस्लामी’होने के तंज को सहना पड़ा था; इसके बावजूद उसने ये सब मतभेद दरकिनार करते हुए उम्मा के प्रति अपनी वफ़ादारी साबित करने के लिए ‘काफ़िर’ मराठाओं के ख़िलाफ़ जंग छेड़ दी, वो भी अपनी अम्मी के हज़ार मर्तबा समझाने के बावजूद, कि उसे मराठाओं का साथ देना चाहिए जो कि उसके अब्बू के मित्र थे|

भारतीय हिन्द फ़ौज (INA) से प्रमाण

अविभाजित ब्रिटिश भारत के इतिहास में हिन्दू-मुस्लिम दंगे एक अहम कड़ी हैं। चूँकि स्वतन्त्र भारत की सरकारों ने भ.हि.फौ. की भूमिका को कमतर करके ही प्रस्तुत किया है, सामान्यजन भी इस फ़ौज की कुछ कमियों की जानकारी से वन्चित रह गए हैं, मुख्यतः फ़ौज के मुस्लिम सैनिकों के व्यवहार को लेकर, जो कि इस लेख का भी प्रमुख केन्द्र-बिन्दु है। जानकारी के लिए यहाँ यह बताना आवश्यक है कि स्वयँ नेताजी भी एक बड़े इस्लाम-पसन्द व्यक्ति थे, तथा मुसलामानों की सुविधा-सुख हेतु सदैव तत्पर से प्रतीत होते थे, एवम् यह तक कहा करते थे हिन्दुओं को बहुसंख्यक होने के नाते मुसलामानों के प्रति उदार होना चाहिए! परन्तु, एक सामान्य मुस्लिम दॄष्टिकोण के अनुसार यह व्यवहार दुर्बलता की एक निशानी मात्र थी। मुसलमान भ.हि.फौ. के अन्तर्भाग जिसका कि नेताजी स्वयँ नेतृत्व करते थे, उसके एक प्रमुख अंग थे, तथा उसकी कई इकाईयों में शामिल थे। इसमें से बड़ी सँख्या में तो वो लोग थे जो भ.हि.फौ. से इसलिए जुड़े थे क्योंकि मित्र-देश तुर्की के विरुद्ध थे, जो कि अभी भी कई मुसलामानों के द्वारा पुराने तुर्क ख़लीफ़ा के अवशेष के रूप में देखा-समझा जाता था। चूँकि नेताजी ने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया, उन्हें तब अचम्भे का शिकार होना पड़ा जब युद्ध के परवर्ती चरण में उन्हें बड़ी सँख्या में मुस्लिम सैनिकों का विश्वासघात, अपसरण देखना पड़ा। इस घटना के पीछे की प्रेरणा थी तुर्की का अपना मत बदलना तथा मित्र-देशों के साथ हो जाना| इनमें से कई सैनिक भाग खड़े हुए, तथा शेष वापस अंग्रेज़ी सेना में जा मिले|

नेताजी ने तुर्की के द्रष्टिकोण में आये इस बदलाव को वैश्विक-राजनीति के परिप्रेक्ष्य में समझाने का प्रयास भी किया, परन्तु इस अपसरण को रोक पाने में असफल रहे। इस प्रकार पुनः मुस्लिमों ने इस तथ्य का परिचय दिया कि उन्हें ‘दार-उल-इस्लामी’ पहचान अधिक प्रिय है, न कि एक राष्ट्रीय पहचान, तथा तुर्की के साथी अंग्रेज़ों की गुलामी करना पसंद किया, बजाए राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए लड़ना। यहाँ यह भी स्मरण रखने योग्य है कि १९४८ में बनी नयी-नवेली पाकी सेना ने इन भगोड़ों में से कईयों को अपने में शामिल किया। यह मलेशिया के तमिल हिन्दुओं के बिलकुल उलट व्यवहार था, जिन्होंने कभी भी अपनी मूल मातृभूमि नहीं देखी थी, फिर भी नेताजी की भारतीय हिन्द फ़ौज में अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़ने को शामिल हो गए, तथा अन्त तक नेताजी को अपना नायक मानते रहे।

वर्त्तमान व भविष्य

आज भी कई ऐसे उदाहरण हैं जिनमें भारतीय सेना में कार्यरत कई मुस्लिम पाकिस्तान के लिए गुप्तचरी करते हुए पकड़े गए हैं। भारतीय सेना में केवल २% भागीदारी होने के बावजूद, मुस्लिम गुप्तचर अधिक सँख्या में पकड़े  गए हैं। वह इसलिए क्योंकि ‘राष्ट्रवाद’ इस्लाम में मूर्ति-भन्जन के समान ही माना गया है; तथा यही कारण है कि देवबन्दी भारत के इस्लाम के नाम पर विभाजन के विचार के विरुद्ध थे, क्योंकि इस्लाम में राष्ट्र-राज्य अथवा राष्ट्रवाद मूर्ति-भन्जन समरूप ही है, और निष्ठा केवल इस्लाम और अल्लाह के प्रति ही माँगी जाती है। इसीलिए आये दिन यह ख़बरें भी सुनने मिलती हैं कि मुस्लिम समाज ‘जय हिन्द’ जैसे नारों के भी विरोध में हैं, क्योंकि इस्लाम सिर्फ़ अल्लाह के सिवाय किसी और के महिमामण्डन की अनुमति नहीं देता।

इसका यह तात्पर्य नहीं कि सेना में कार्यरत मुस्लिम देशद्रोही ही हैं। इसी सेना में से मुस्लिम रणबाँकुरे भी निकले हैं जिन्हें ‘परमवीर चक्र’ जैसे सम्मान प्राप्त हुए। अपितु, सँख्या पूरे परिप्रेक्ष्य में देखें तो नाममात्र ही है। इस दृष्टि से, यह भी विचारणीय है कि ऐसे कुछ के लिए क्या पूरे मुस्लिम समुदाय पर पूर्णरूपेण भरोसा करने का जोख़िम उठाना तर्कसंगत रहेगा, विशेषकर कि तब जब भारतीय भूभाग के एक बड़े हिस्से का हमारे हाथ से निकलकर पश्चिमी/मध्य-पश्चिमी इस्लामी बर्बरों के हाथों में पहुँच जाना एक बेहद गम्भीर तथा वास्तविक ख़तरा है (और आख्रिकार, विभाजन की त्रासदी कोई ज्युरास्सिक काल में तो हुयी नहीं थी!)?!! नए ज़माने की लड़ाईयों में निर्णायक मोड़ गुप्त सूचनाओं तथा उनके आधार पर की गयी कार्यवाहियों पर अधिक निर्भर करते हैं। इन मुद्दों पर विचार करते हुए यह समझा जा सकता है कि केवल अपनी सतही नैतिकता की ख़ातिर इस्लाम जैसी विघटनकारी शक्ति के ख़तरे को दरकिनार कर देना निरी मूर्खता ही होगी।

सच्चर समिति की रिपोर्ट के आधार पर यह विवाद उपजा कि क्या सेना की धार्मिक रचना में परिवर्तन करके मुसलमानों को अधिक सँख्या में चयनित किया जाना सही होगा?! मुस्लिम विश्वासघात के लम्बे इतिहास को नज़र में रखते हुए, ऐसा करना देश की सुरक्षा के साथ एक खिलवाड़ करना ही होगा। जबरदस्ती की नैतिकता की खोखली बातें करके और उनके लिए कुतर्कबाजी करके बजाय फ़र्ज़ी सेक्युलरिज़म की ख़ातिर, भारत को चाहिए कि यथार्थवादी रुख अपनाते हुए सेना में मुस्लिमों के चयन पर एक सीमा को लागू रखे, जैसी नीति स्वतन्त्रता के बाद से रही ही है। श्री जॉर्ज फर्नांडिस के शब्दों में – “मुस्लिम, सेना में अधिक माँग में नहीं हैं क्योंकि वे सदैव से अविश्वसनीय माने जाते रहे हैं, भले ही इसे हम खुलेआम स्वीकार करें या न करें। अधिकतर भारतीय, मुसलामानों को पाकिस्तान का पाँचवा स्तम्भ मानते हैं।”

यदि भारत, इतिहास में विजयनगर तथा मराठाओं की घटनाओं के सबक़ की उपेक्षा करके कोई क़दम उठाता है, तो उसका भी आने वाले समय की इतिहास-पुस्तकों तथा अजायबघरों में जल्द दर्ज हो जाना लगभग तय है।

Courtesy:
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=488119928196586&id=436564770018769

हिन्दुस्तान के लोगो की असली औकात

हिन्दुस्तान के लोगो की असली औकात !

वियतनाम जैसे छोटे से देश ने अमेरिका को पराजित कर दिया था। यदि सामरिक उद्देश्यो की दृष्टि से देखे तो सही भी है। इस युद्ध मे अमेरिका ने लगभग अपने 58,315 ( अठ्ठावन हजार तीन सौ पन्द्रह ) सैनिको की आहुति दी, लगभग 3,03000 (तीन लाख अमेरिकी सैनिक जख्मी हुए थे। दूसरी और दक्षिणी वियतनाम ने अपने 65,000 सिविलियन और 445,000 ( चार लाख पैंतालीस हजार सैनिको की आहुति दी उत्तरी वियतनाम ने अपने लगभग पाँच लाख सैनिक और असैनिक खोये थे।

इतने बडे स्तर पर जान - माल के नुकसान के बाद भी वियतनाम पीछे नही हटा .....

19 साल पाँच महीनो तक युद्ध चला , बाद मे अमेरिका पीछे हटा, मगर वियतनाम ने घुटने नही टेके, अब जरा सोचिये कि अगर वियतनाम की जगह भारत होता , तो क्या हम इतनी बडी, और इतने लम्बे समय तक कुर्बानी दे सकते थे ???

ज्यादा झाड पर चढने की जरूरत नही , ज्यादा सूरमाई , और वीरता की डींगे मारने की भी जरूरत नही , वैसे भी युद्ध के मैदान मे हम हिंदुओ का पराक्रम तो पूरे विश्व इतिहास मे जाना जाता है किंतु पिछले एक हजार वर्षो के इतिहास मे कई लडाई ऐसी नही जिसमे हम हारे नही चोर, डाकु, लुटेरे, गुलाम, और ना जाने कौन कौन आतताई मुठ्ठी भर घुडसवारो के साथ आते रहे ...हमे हराते रहे , और अपनी दासता के लिए मजबूर होते रहे। आज जब इतिहास पढते है , तो अंतिम विश्लेषण के रूप मे पढाया जाता है, कि हम संगठित नही थे , आपस मे ईर्ष्या और द्वेष के कारण आपस मे लडते रहते थे। हमारे अंदर फूट थी। हम विदेशियो का प्रतिकार नही कर पाये , आदि आदि आदि .....

यदि देखा जाऐ , तो भारतीय इतिहास मे जितने , स्वार्थी , गद्दार , और देशद्रोही मिलेंगें , शायद पूरे विश्व मे मिलने मुश्किल है ......ये वर्तमान के हिन्दू दस सालो तक युद्ध लडना तो दूर , कुछ ही घंटो के युद्ध मे हाँफ जायेगी। जो लोग आलू, प्याज , टमाटर के दामो मे पाँच दस रूपयो की बढोत्तरी बर्दाश्त नही कर सकते , वो दस साल लंबा युद्ध झेलना तो दूर , सोच भी नही सकते ....

आईये कुछ युद्धो एवं उनमे हुई कैजुल्टियो का विवरण भी देख , साथ ही साथ समायवधि को भी जान लें।

1947 मे आजादी मिलते ही , हम कश्मीर मे पाकिस्तान के साथ युद्ध मैदान मे खडे थे , लगभग एक साल और एक महीने मे ही,1500 सैनिक खोकर , हम समझौते पर उतर आये और मामला संयुक्त राष्ट्र संघ मे ले गये , क्योकि बकौल नेहरू देश युद्ध का खर्च नही उठा पा रहा था। जबकि हमसे खराब अर्थवयवस्था होने के बावजूद पाकिस्तान पीछे नही हटा , और आज तक पाक - अधिकृत कश्मीर पर उसका कब्जा बरकरार है।

1962 मे चीन के साथ युद्ध मैदान मे थे , हमने लाखो वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र और लगभग 1383 सैनिक खोये , जबकि 1696 लापता और उतने ही घायल हुए , मात्र एक महीने के युद्ध मे हम कंगाली के मुहाने पर खडे थे , क्योकि कोई भी युद्ध सैनिक लडते है , मगर वास्तविक अवलंब देश की आर्थिक शक्ति होती है जो देश को युद्ध मैदान मे खडा रखती है।

सितम्बर 1965 मे हम पाकिस्तान के साथ दूसरे युद्ध मे उतरे , मात्र 17 दिनो की लडाई मे ही, हमे दस्त लग गये, और तत्परता से सीज-फायर का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, युद्ध में हमने अपने , लगभग 3800 सैनिक खोये , मगर हमारे देशप्रेम की पोल दो हफ्तो मे ही खुल गई।

सन् 1971 मे हम एक बार फिर पाकिस्तान के साथ 13 दिनो के लिए युद्ध मे उतरे , निसंदेह हमने विजयश्री प्राप्त की , और पाकिस्तान के दो टुकडे कर दिये ,लगभग 4000 जवान शहीद हुए , मगर जल्द ही शिमला समझौते के तहत हमने खुद को छला , और युद्ध के कारण बढी मँहगाई की वजह से "आपातकाल" के दुष्प्रभावो को झेला, फलस्वरूप इंदिरा गाँधी को सत्ता गँवानी पडी।

इसके बाद श्रीलंका मे अनावश्यक हस्तक्षेप करके , ऑपरेशन "पवन" के तहत हमने श्रीलंका मे अपनी सेना भेजी, और 1200 सैनिको की जान के साथ साथ, राजीव गाँधी ने सत्ता से भी हाथ धोया।

वर्ष 1999 पाकिस्तान के साथ कारगिल मे लडे गये चौथे युद्ध मे हमने 527 जवान खोये , जिसके बाद कई देशो द्वारा इंबार्गो लगने के बाद , हमींने वाजपेयी जी को पानी पी पी के कोसा और जवानो की मौतो का जिम्मेदार तक बताया।

देखा जाए तो 1947 मे आजादी मिलने के बाद आज तक सैन्य अभियानो मे हमने लगभग 12,000 सैनिको की कुर्बानी दी है , ( कश्मीर के छद्म युद्ध के आँकडे शामिल नही है ) जबकि इससे ज्यादा पाकिस्तानी सैनिक तो केवल 1971 मे ही पाकिस्तान ने गँवाये थे। अपनी आजादी को अक्षुण्य रखने के लिए ये कीमत कोई ज्यादा भी नही है , 125 करोड लोगो का देश है हम, शायद इसीलिए आजादी और स्वाधीनता की कीमत जान ही नही पाये हम लोग , क्योकि इसके लिए हमने कभी कोई बडी कीमत नही चुकाई ....शायद इसीलिए हम स्वशासन और राष्ट्रहित ,की कीमत अभी तक नही जानते , क्योकि हमने कभी कोई बडा मूल्य चुकाया ही नही।

आगरा शिखर वार्ता मे, हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी मुशर्रफ की चरण वंदना मे मशगूल दिखे , मानो वो कोई ईश्वरीय दूत हो ...अब ऐसे देश के लोगो से क्या अपेक्षा भी की जा सकती है , कि वो राष्ट्रवाद की बात करे ???

6 पुलिस वालों की शहादत पर पूरा देश , पाकिस्तानी सरकार के बजाय उनकी सेना से संवाद करने को लेकर गाल बजाने लगता है, ये है हमारा यौद्धाओ के रूप मे प्रदर्शन। कभी उनके दस लोग मुंबई को तीन दिनो तक दहलाये रखते है , तो कभी चार लोग पाँच दिनो तक पठानकोट जैसी घटनाओ को अंजाम देते है , और हम बजाय प्रतिक्रियात्मक रूख अपनाये , अपनी सरकारो को कोसने लगते है , मानो हमारी सरकार ने ही निमंत्रण भेजकर बुलाया हो।

दोस्तो राष्ट्रवाद , बहुत बडी चीज है, और दुर्भाग्य से हमारी संकुचित मूढ दिमाग से बहुत परे की चीज , दूध , घी , प्याज , टमाटर ,पेट्रोल की कीमतो , और आरक्षण के नाम पर विलाप करने वाले देश के नागरिक , शायद कौमी सम्मान , और अपनी पहचान के लिए मिट जाने का हुनर नही जानते , सीख भी नही सकते , ये केवल टुच्ची राजनीति , और स्वार्थ के गुलाम है ....एक कमजोर , कायर ,और बेगैरत कौम की तरह , जो आसानी से विदेशी प्रभुत्व के समक्ष , केवल अपने स्वार्थ के निमित्त नतमस्तक होने की कला मे पारंगत होकर, अपनी बुजदिली को , अहिंसा के झूठे लाबादे मे लपेटे हुए है।

वियतनाम , इजराइल , जैसे देशो से शायद हमे , राष्ट्रवाद , राष्ट्रभक्ति , और कौमी सम्मान के लिए सब कुछ न्योछावर कर देने के जज्बे सहित , बहुत कुछ सीखना बाकी है। 19 साल विश्व की महाशक्ति के सामने टिके रहने वाले छोटे छोटे देशो मे यदि आलू, प्याज , टमाटर , पैट्रोल की कीमतो वाले लोग होते , तो शायद उन देशो को भी भारत की तरह , विदेशी दासता 1000 सालो तक ढोना पडता।

Courtesy: Hindu Jaagran, https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=487943438214235&substory_index=0&id=436564770018769

वेद_vs_विज्ञान भाग -14, जन्तु-जगत् का वर्गीकरण

#वेद_vs_विज्ञान भाग -14
                           #जन्तु-जगत् का वर्गीकरण           
             Classification of Animal Kingdom
#परिचय -
जीव जगत के समुचित अध्ययन के लिये आवश्यक है कि विभिन्न गुणधर्म एवं विशेषताओं वाले जीव अलग-अलग श्रेणियों में रखे जाऐं। इस तरह से जीवों के वर्गीकरण को वर्गिकी या वर्गीकरण विज्ञान कहते हैं। 
वर्गिकी का कार्य आकारिकी, आकृतिविज्ञान (morphology) क्रियाविज्ञान (physiology), परिस्थितिकी (ecology) और आनुवंशिकी (genetics) पर आधारित है।
#आधुनिक विज्ञान के अनुसार -
पहले लोग जन्तुओं को अपने हिसाब से वर्गों में बाँटते थे, जैसे- घातक-अघातक, उड़ने वाले, न उड़ने वाले, भक्ष्य (Edible) अभक्ष्य, लाभकारी या हानिकारक जन्तु आदि। सुप्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक अरस्तू (Aristotle, 384 ई. पूर्व) ने, जिन्हें प्राणिविज्ञान का जनक (Father of Zoology) कहते हैं, सबसे पहले उस समय ज्ञात जंतुओं का मौलिक अर्थात प्राकृतिक समानताओं तथा विषमताओं के आधार पर वर्गीकरण किया। अरस्तू के लगभग 2000 वर्ष बाद, सत्रहवीं सदी से जॉन रे (1693) ने पहले-पहल प्राणि जाति (Species) की परिभाषा आधार पर, वर्गीकरण किया।
कैरोलस लिनियस (1735) ने अपनी पुस्तक सिस्टेमा नेचुरी (Systema Naturae) में 4236 ज्ञात जातियों का वर्गीकरण किया। पुस्तक के दसवें संस्करण (1758) में वर्गीकरण की जो प्रणाली अपनाई गई उसी से आधुनिक वर्गीकरण प्रणाली की नींव पड़ी। उन्होंने ही प्राणी-जातियों के नामकरण हेतु एक द्विनाम पद्धति (Binomial nomenclature) का विकास किया। उन्हें इसीलिए आधुनिक वर्गीकरण का पिता (Father of Modern Taxonomy) कहते हैं।
#वैदिक साहित्यो में वर्गीकरण -
चरक ने भी प्राणियों को उनके जन्म के अनुसार जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उदि्भज वर्गों में विभाजित किया है (चरक संहिता, सूत्रस्थान, २७/३५-५४) उन्होंने प्राणियों के आहार-विहार के आधार पर भी निम्न प्रकार से वर्गीकरण किया है-
1. प्रसह- जो बलात्‌ छीनकर खाते हैं। इस वर्ग में चीता, सिंह, रीछ, वानर, भेड़िया, व्याघ्र, पर्वतों के पास रहने वाले बहुत बालों वाले कुत्ते, बभ्रु, मार्जार, कुत्ता, चूहा, लोमड़ी, गीदड़, बाघ, बाज, कौवा, शशघ्री (ऐसे पक्षी जो शशक को भी अपने पंजों में पकड़ कर उठा ले जाते हैं) चील, भास, गिद्ध, उल्लू, सामान्य घरेलू चिड़िया (गौरेया), कुरर (वह पक्षी जो जल स्थित मछली को अपने नख से भेद कर उड़ा ले जाता है।)
2.भूमिशय-बिलों में रहने वाले जन्तु-सर्प (श्वेत-श्यामवर्ण का) चित्रपृष्ठ (जिसकी पृष्ठ चित्रित होती है), काकुली मृग-एक विशेष प्रकार का सर्प- मालुयासर्प, मण्डूक (मेंढक) गोह, सेह, गण्डक, कदली (व्याघ्र के आकार की बड़ी बिल्ली), नकुल (नेवला), श्वावित्‌ (सेह का भेद), चूहा आदि।
3.अनूपदेश के पशु-अर्थात्‌ जल प्रधान देश में रहने वाले प्राणी। इन में सूकर (महा शूकर), चमर (जिनकी पूंछ चंवर बनाने के काम आती है), गैण्डा, महिष (जंगली भैंसा), नीलगाय, हाथी, हिरण , वराह (सुअर) बारहसिंगा- बहुत सिंगों वाले हिरण सम्मिलित हैं।
4.वारिशय-जल में रहने वाले जन्तु-कछुआ, केकड़ा, मछली, शिशुमार (घड़ियाल, नक्र की एक जाति) पक्षी। हंस, तिमिंगिल, शुक्ति (सीप का कीड़ा), शंख, ऊदबिलाव, कुम्भीर (घड़ियाल), मकर (मगरमच्छ) आदि।
वारिचारी-जल में संचार करने वाले पक्षी - हंस क्रौञ्च, बलाका, बगुला, कारण्डव (एक प्रकार का हंस), प्लव, शरारी, केशरी, मानतुण्डका, मृणालण्ठ, मद्गु (जलकाक), कादम्ब (कलहंस), काकतुण्डका (श्वेत कारण्डव-हंस की जाति) उत्क्रोश (कुरर पक्षी की जाति) पुण्डरीकाक्ष, चातक, जलमुर्गा, नन्दी मुखी, समुख, सहचारी, रोहिणी, सारस, चकवा आदि।
5.जांगल पशु- स्थल पर उत्पन्न होने वाले तथा जंगल में संचार करने वाले पशु- चीतल, हिरण, शरभ (ऊंट के सदृश ,चारुष्क (हरिण की जाति) लाल वर्ण का हरिण, एण (काला हिरण) शम्बर (हिरण भेद) वरपोत (मृग भेद), ऋष्य आदि जंगली मृग।
6.विष्किर पक्षी-जो अपनी चोंच और पैरों से इधर-उधर बिखेर कर खाते हैं, वे विष्किर पक्षी हैं। इनमें लावा (बटेर), तीतर, श्वेत तीतर, चकोर, उपचक्र (चकोर का एक भेद), लाल वर्ग का कुक्कुभ (कुको), वर्तक, वर्तिका, मोर, मुर्गा, कंक, गिरिवर्तक, गोनर्द, क्रनर और बारट आदि।
7.प्रतुद पक्षी-जो चोंच या पंजों से बार-बार चोट लगाकर आहार को खाते हैं। कठफोड़ा भृंगराज (कृष्णवर्ण का पक्षी विशेष), जीवंजीवक, (विष को देखने से ही इस पक्षी की मृत्यु हो जाती है), कोकिल, कैरात (कोकिक का भेद), 8.गोपपुत्र- प्रियात्मज, लट्वा, बभ्रु, वटहा, डिण्डिमानक, जटायु, लौहपृष्ठ, बया, कपोत (घुग्घु), तोता, सारंग (चातक), शिरटी, शरिका (मैना) कलविंक (गृहचटक अथवा लाल सिर और काली गर्दन वाली गृहचटक सदृश चिड़ियां), चटक, बुलबुल, कबूतर आदि।
उपर्युक्त वर्गीकरण के साथ चरक ने इन प्राणियों की मांस और उसके उपयोग के साथ ही बात, पित्त और कफ पर उसके प्रभाव की भी विस्तृत विवेचना प्रस्तुत की है। चकोर, मुर्गी, मोर, बया और चिड़ियों के अंडों की भी आहार सृंखला के रूप में चर्चा की गई है।
ऐसे ही सुश्रुत की सुश्रुत संहिता, पाणिनि के अष्टाध्यायी, पतञ्जलि के महाभाष्य, अमर सिंह के अमरकोष, दर्शन के प्रशस्तपादभाष्य आदि ग्रंथों में प्राणियों के वर्गीकरण के विस्तृत विवरण मिलते हैं। (प्राचीन भारत में विज्ञान और शिल्प-पृ.सं.११५-११७)
#विशेष --
समस्त प्राणियों को दो भागों में बांटा गया है, योनिज तथा आयोनिज। दो के संयोग से उत्पन्न या अपने आप ही अमीबा की तरह विकसित होने वाले।
इसके अतिरिक्त स्थूल रूप से प्राणियों को तीन भागों में बांटा गया:-
जलचर - जल में रहने वाले सभी प्राणी।
थलचर - पृथ्वी पर विचरण करने वाले सभी प्राणी।
नभचर - आकाश में विहार करने वाले सभी प्राणी।
इसके अतिरिक्त प्राणियों की उत्पत्ति के आधार पर ८४ लाख योनियों को चार प्रकार में वर्गीकृत किया गया।
जरायुज - माता के गर्भ से जन्म लेने वाले मनुष्य, पशु जरायुज कहलाते हैं।
अण्डज - अण्डों से उत्पन्न होने वाले प्राणी अण्डज कहलाये।
स्वदेज- मल, मूत्र, पसीना आदि से उत्पन्न क्षुद्र जन्तु स्वेदज कहलाते हैं।
उदि्भज- पृथ्वी से उत्पन्न प्राणियों को उदि्भज वर्ग में शामिल किया गया।
Courtesy: https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=272453089887770&id=100013692425716

खंडन, वैश्या_के_यहां_की_मिट्टी_का_माँ_दुर्गा_की_मूर्ति_बनाने_में_प्रयोग

#खण्डन --- - #वैश्या_के_यहां_की_मिट्टी_का_माँ_दुर्गा_की_मूर्ति_बनाने_में_प्रयोग - कई दिनों से एक अमर्यादित पोस्ट देखने को मिल रही थी जिसमे...