Thursday, 8 June 2017

शाहजहाँ ....हवस का मौलवी और हिंदुओं का हत्यारा

शाहजहाँ ....हवस का मौलवी और हिंदुओं का हत्यारा ..

शाहजहाँ के हरम में ८००० रखैलें थीं जो उसे
उसके पिता जहाँगीर से विरासत में मिली थी।
उसने बाप की सम्पत्ति को और बढ़ाया।

उसने हरम की महिलाओं की व्यापक छाँट
की तथा बुढ़ियाओं को भगा कर और अन्य
हिन्दू परिवारों से बलात लाकर हरम को
बढ़ाता ही रहा।''
(अकबर दी ग्रेट मुगल : वी स्मिथ, पृष्ठ ३५९)

कहते हैं कि उन्हीं भगायी गयी महिलाओं से दिल्ली
का रेडलाइट एरिया जी.बी. रोड गुलजार हुआ था
और वहाँ इस धंधे की शुरूआत हुई थी।

जबरन अगवा की हुई हिन्दू महिलाओं की
यौन-गुलामी और यौन व्यापार को शाहजहाँ
प्रश्रय देता था, और अक्सर अपने मंत्रियों
और सम्बन्धियों को पुरस्कार स्वरूप अनेकों
हिन्दू महिलाओं को उपहार में दिया करता था।

यह नर पशु,यौनाचार के प्रति इतना आकर्षित
और उत्साही था,कि हिन्दू महिलाओं का मीना
बाजार लगाया करता था,यहाँ तक कि अपने
महल में भी।

सुप्रसिद्ध यूरोपीय यात्री फ्रांकोइस बर्नियर
ने इस विषय में टिप्पणी की थी कि,
''महल में बार-बार लगने वाले मीना बाजार,
जहाँ अगवा कर लाई हुई सैकड़ों हिन्दू महिलाओं
का, क्रय-विक्रय हुआ करता था,राज्य द्वारा बड़ी
संख्या में नाचने वाली लड़कियों की व्यवस्था,और
नपुसंक बनाये गये सैकड़ों लड़कों की हरमों में
उपस्थिती, शाहजहाँ की अनंत वासना के समाधान
के लिए ही थी।
(टे्रविल्स इन दी मुगल ऐम्पायर-
फ्रान्कोइसबर्नियर :पुनः लिखित वी. स्मिथ,
औक्सफोर्ड १९३४)

**शाहजहाँ को प्रेम की मिसाल के रूप पेश किया
जाता रहा है और किया भी क्यों न जाए।
८००० औरतों को अपने हरम में रखने वाला अगर
किसी एक में ज्यादा रुचि दिखाए तो वो उसका प्यार
ही कहा जाएगा।आप यह जानकर हैरान हो जायेंगे
कि मुमताज का नाम मुमताज महल था ही नहीं
बल्कि उसका असली नाम "अर्जुमंद-बानो-बेगम" था।

और तो और जिस शाहजहाँ और मुमताज के प्यार
की इतनी डींगे हांकी जाती है वो शाहजहाँ की ना
तो पहली पत्नी थी ना ही आखिरी ।

मुमताज शाहजहाँ की सात बीबियों में चौथी थी।
इसका मतलब है कि शाहजहाँ ने मुमताज से पहले
3 शादियाँ कर रखी थी और,मुमताज से शादी करने
के बाद भी उसका मन नहीं भरा तथा उसके बाद भी
उस ने 3 शादियाँ और की यहाँ तक कि मुमताज के
मरने के एक हफ्ते के अन्दर ही उसकी बहन फरजाना
से शादी कर ली थी।
जिसे उसने रखैल बना कर रखा हुआ था जिससे शादी
करने से पहले ही शाहजहाँ को एक बेटा भी था।

अगर शाहजहाँ को मुमताज से इतना ही प्यार था तो मुमताज से शादी के बाद भी शाहजहाँ ने 3 और
शादियाँ क्यों की....?????

अब आप यह भी जान लो कि शाहजहाँ की सातों
बीबियों में सबसे सुन्दर मुमताज नहीं बल्कि इशरत
बानो थी जो कि उसकी पहली पत्नी थी ।

उस से भी घिनौना तथ्य यह है कि शाहजहाँ से
शादी करते समय मुमताज कोई कुंवारी लड़की
नहीं थी बल्कि वो शादीशुदा थी और,उसका पति शाहजहाँ की सेना में सूबेदार था जिसका नाम "शेर अफगान खान" था।शाहजहाँ ने शेर अफगान खान
की हत्या कर मुमताज से शादी की थी।

गौर करने लायक बात यह भी है कि ३८ वर्षीय
मुमताज की मौत कोई बीमारी या एक्सीडेंट से
नहीं बल्कि चौदहवें बच्चे को जन्म देने के दौरान
अत्यधिक कमजोरी के कारण हुई थी।

यानी शाहजहाँ ने उसे बच्चे पैदा करने की मशीन
ही नहीं बल्कि फैक्ट्री बनाकर मार डाला।

**शाहजहाँ कामुकता के लिए इतना कुख्यात
था कि कई इतिहासकारों ने उसे उसकी अपनी
सगी बेटी जहाँआरा के साथ स्वयं सम्भोग करने
का दोषी कहा है।

शाहजहाँ और मुमताज महल की बड़ी बेटी
जहाँआरा बिल्कुल अपनी माँ की तरह लगती थी।

इसीलिए मुमताज की मृत्यु के बाद उसकी याद में
लम्पट शाहजहाँ ने अपनी ही बेटी जहाँआरा को
फंसाकर भोगना शुरू कर दिया था।

जहाँआरा को शाहजहाँ इतना प्यार करता था
कि उसने उसका निकाह तक होने न दिया।

बाप-बेटी के इस प्यार को देखकर जब महल में
चर्चा शुरू हुई,तो मुल्ला-मौलवियों की एक बैठक
बुलाई गयी और उन्होंने इस पाप को जायज ठहराने
के लिए एक हदीस का उद्धरण दिया और कहा कि - "माली को अपने द्वारा लगाये पेड़ का फल खाने का
हक़ है"।

(Francois Bernier wrote,
" Shah Jahan used to have regular sex
with his eldest daughter Jahan Ara.
To defend himself,Shah Jahan used to
say that,it was the privilege of a planter
to taste the fruit of the tree he had
planted.")

**इतना ही नहीं जहाँआरा के किसी भी आशिक
को वह उसके पास फटकने नहीं देता था।
कहा जाता है की एकबार जहाँआरा जब अपने एक आशिक के साथ इश्क लड़ा रही थी तो शाहजहाँ आ
गया जिससे डरकर वह हरम के तंदूर में छिप गया, शाहजहाँ नेतंदूर में आग लगवा दी और उसे जिन्दा
जला दिया।

**दरअसल अकबर ने यह नियम बना दिया था
कि मुगलिया खानदान की बेटियों की शादी नहीं
होगी।
इतिहासकार इसके लिए कई कारण बताते हैं।
इसका परिणाम यह होता था कि मुग़लखानदान
की लड़कियां अपने जिस्मानी भूख मिटाने के लिए
अवैध तरीके से दरबारी,नौकर के साथ साथ,रिश्तेदार
यहाँ तक की सगे सम्बन्धियों का भी सहारा लेती थी।

**जहाँआरा अपने लम्पट बाप के लिए लड़कियाँ भी
फंसाकर लाती थी।
जहाँआरा की मदद से शाहजहाँ ने मुमताज के भाई
शाइस्ता खान की बीबी से कई बार बलात्कार किया था।

**शाहजहाँ के राजज्योतिष की 13 वर्षीय ब्राह्मण
लडकी को जहाँआरा ने अपने महल में बुलाकर धोखे
से नशा करा बाप के हवाले कर दिया था जिससे शाहजहाँ
ने 58 वें वर्ष में उस 13 बर्ष की ब्राह्मण कन्या से निकाह
किया था।

बाद में इसी ब्राहम्ण कन्या ने शाहजहाँ के कैद होने के
बाद औरंगजेब से बचने और एक बार फिर से हवस की
सामग्री बनने से खुद को बचाने के लिए अपने ही हाथों
अपने चेहरे पर तेजाब डाल लिया था।

**शाहजहाँ शेखी मारा करता था कि ' 'वह तिमूर
(तैमूरलंग)का वंशज है जो भारत में तलवार और
अग्नि लाया था।
उस उजबेकिस्तान के जंगली जानवर तिमूर से और
उसकी हिन्दुओं के रक्तपात की उपलब्धि से इतना
प्रभावित था कि ''उसने अपना नाम तिमूरद्वितीय
रख लिया''।
(दी लीगेसी ऑफ मुस्लिम रूल इन इण्डिया-
डॉ. के.एस. लाल, १९९२ पृष्ठ- १३२).

**बहुत प्रारम्भिक अवस्था से ही शाहजहाँ ने काफिरों
(हिन्दुओं) के प्रति युद्ध के लिए साहस व रुचि दिखाई थी।

अलग-अलग इतिहासकारों ने लिखा था कि,
''शहजादे के रूप में ही शाहजहाँ ने फतेहपुर सीकरी
पर अधिकार करलिया था और आगरा शहर में हिन्दुओं
का भीषण नरसंहार किया था ।

**भारत यात्रा पर आये देला वैले,इटली के एक धनी
व्यक्ति के अुनसार -शाहजहाँ की सेना ने भयानक
बर्बरता का परिचय कराया था।
हिन्दू नागरिकों को घोर यातनाओं द्वारा अपने संचित
धन को दे देने के लिए विवश किया गया,और अनेकों
उच्च कुल की कुलीन हिन्दू महिलाओं का शील भंग
किया गया।''
(कीन्स हैण्ड बुक फौर विजिटर्स टू आगरा एण्ड
इट्सनेबरहुड, पृष्ठ २५)

**हमारे वामपंथी इतिहासकारों ने शाहजहाँ को
एक महान निर्माता के रूप में चित्रित किया है।

किन्तु इस मुजाहिद ने अनेकों कला के प्रतीक सुन्दर
हिन्दू मन्दिरों और अनेकों हिन्दू भवन निर्माण कला
के केन्द्रों का बड़ी लगन और जोश से विध्वंस किया था

अब्दुल हमीद ने अपने इतिहास अभिलेख, 'बादशाहनामा' में लिखा था-'महामहिम शहंशाह महोदय की सूचना में
लाया गया कि हिन्दुओं के एक प्रमुख केन्द्र,बनारस में
उनके अब्बा हुजूर के शासनकाल में अनेकों मन्दिरों के
पुनः निर्माण का काम प्रारम्भ हुआ था और काफिर
हिन्दू अब उन्हें पूर्ण कर देने के निकट आ पहुँचे हैं।

इस्लाम पंथ के रक्षक,शहंशाह ने आदेश दिया कि
बनारस में और उनके सारे राज्य में अन्यत्र सभी
स्थानों पर जिन मन्दिरों का निर्माण कार्य आरम्भ है,
उन सभी का विध्वंस कर दिया जाए।

**इलाहाबाद प्रदेश से सूचना प्राप्त हो गई कि
जिला बनारस के छिहत्तर मन्दिरों का ध्वंस कर
दिया गया था।''
(बादशाहनामा : अब्दुल हमीद लाहौरी,
अनुवाद एलियट और डाउसन, खण्ड VII,
पृष्ठ ३६)

**हिन्दू मंदिरों को अपवित्र करने और उन्हें ध्वस्त करनेकी प्रथा ने शाहजहाँ के काल में एक व्यवस्थित विकराल रूप धारण कर लिया था।
(मध्यकालीन भारत - हरीश्चंद्र वर्मा - पेज-१४१)

*''कश्मीर से लौटते समय १६३२ में शाहजहाँ को बताया गया कि अनेकों मुस्लिम बनायी गयी महिलायें फिर से हिन्दू हो गईं हैं और उन्होंने हिन्दू परिवारों में
शादी कर ली है।
शहंशाह के आदेश पर इन सभी हिन्दुओं को बन्दी
बना लिया गया।

प्रथम उन सभी पर इतना आर्थिक दण्ड थोपा गया
कि उनमें से कोई भुगतान नहीं कर सका।

तब इस्लाम स्वीकार कर लेने और मृत्यु में से एक को
चुन लेने का विकल्प दिया गया।

जिन्होनें धर्मान्तरण स्वीकार नहीं किया,उन सभी
पुरूषों का सर काट दिया गया।

लगभग चार हजार पाँच सौं महिलाओं को बलात् मुसलमान बना लिया गया और उन्हें सिपहसालारों, अफसरों और शहंशाह के नजदीकी लोगों और
रिश्तेदारों के हरम में भेज दिया गया।''
(हिस्ट्री एण्ड कल्चर ऑफ दी इण्डियन पीपुल :
आर.सी. मजूमदार, भारतीय विद्या भवन,पृष्ठ३१२)

* १६५७ में शाहजहाँ बीमार पड़ा और उसी के
बेटे औरंगजेब ने उसे उसकी रखैल जहाँआरा के
साथ आगरा के किले में बंद कर दिया।

परन्तु औरंगजेब मे एक आदर्श बेटे का भी फर्ज निभाया
और अपने बाप की कामुकता को समझते हुए उसे अपने
साथ ४० रखैलें (शाही वेश्याएँ) रखने की इजाजत दे दी।

दिल्ली आकर उसने बाप के हजारों रखैलों में से कुछ गिनी चुनी औरतों को अपने हरम में डालकर बाकी
सभी को उसने किले से बाहर निकाल दिया।

उन हजारों महिलाओं को भी दिल्ली के उसी हिस्से
में पनाह मिली जिसे आज दिल्ली का रेड लाईट एरिया जीबी रोड कहा जाता है।

जो उसके अब्बा शाहजहाँ की मेहरबानी से ही बसा और गुलजार हुआ था ।

***शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैन शाहजहाँ की मृत्यु आगरे के किले में ही २२ जनवरी १६६६ ईस्वी में ७४ साल की उम्र में द हिस्ट्री चैनल के अनुसार अत्यधिक कमोत्तेजक दवाएँ खा लेने का कारण हुई थी। यानी जिन्दगी के आखिरी वक्त तक वो अय्याशी ही करता रहा था।

** अब आप खुद ही सोचें कि क्यों ऐसे बदचलन
और दुश्चरित्र इंसान को प्यार की निशानी समझा कर
महानबताया जाता है...... ?????

क्या ऐसा बदचलन इंसान कभी किसी से प्यार कर
सकता है....?????

क्या ऐसे वहशी और क्रूर व्यक्ति की अय्याशी की कसमेंखाकर लोग अपने प्यार को बे-इज्जत नही
करते हैं ??

दरअसल ताजमहल और प्यार की कहानी इसीलिए
गढ़ी गयी है कि लोगों को गुमराह किया जा सके और लोगों खास कर हिन्दुओं से छुपायी जा सके कि ताजमहल कोई प्यार की निशानी नहीं बल्कि महाराज जय सिंह द्वारा बनवाया गया भगवान् शिव का मंदिर""तेजो महालय"" है....!

और जिसे प्रमाणित करने के लिए डा० सुब्रहमण्यम स्वामी आज भी सुप्रीम कोर्ट में सत्य की लड़ाई लड़
रहे हैं।

** असलियत में मुगल इस देश में धर्मान्तरण,
लूट-खसोट और अय्याशी ही करते रहे परन्तु नेहरू
के आदेश पर हमारे इतिहासकारों नें इन्हें जबरदस्ती महान बनाया।
और ये सब हुआ झूठी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर...
#आज़ाद #Rashtraputra #Aazaad #AzadArmy #VandeMatram #News

Courtesy: https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=218735401977876&substory_index=0&id=192380787946671

Tuesday, 6 June 2017

This day in 1674, Shivaji was crowned king of the Marathas

6th june

This day in 1674, Shivaji was crowned king of the Marathas in a lavish ceremony at Raigad

( In the Hindu calendar it was on the 13th day (trayodashi) of the first fortnight of the month of Jyeshtha in the year 1596)

Pandit Gaga Bhatt  from varanasi officiated, holding a gold vessel filled with the seven sacred waters of the rivers Yamuna, Indus, Ganges, Godavari, Krishna and Kaveri over Shivaji's head, and chanted the coronation mantras.

After the ablution, Shivaji bowed before Jijabai and touched her feet.

Nearly fifty thousand people gathered at Raigad for the ceremonies.

Shivaji was bestowed with the sacred thread brahmin thread-the " jaanva", with the Vedas and was bathed in an abhisheka.

Shivaji was entitled Shakakarta ("founder of an era")
Kshatriya Kulavantas ("head of Kshatriyas"),
Chhatrapati ("paramount sovereign").
He also took the title of "Haindava Dharmodhhaarak".
(the keeper of the hindu dharma )

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The state as Shivaji founded it was a Maratha kingdom comprising about a mere  4.1% of the subcontinent at the time he died,but less than a  150 years later after his coronation   it was to increase in size and heterogeneity,

By the time of the Peshwas in the early 18th century the Marathas were dominant across the northern and central regions of the Indian Subcontinent their empire/confederacy spanned across 2,800,000 km2(1,100,000 sq mi)
from Attock in northwest present day Pakistan to Thanjavur in present  day tamil nadu,from Vasai  -present  day Mumbai to Odisha and parts of West Bengal

The back of the mughal empire was broken, the smaller muslim principalities neutralised or made vassals and the proud hindu saffron , the dual triangular battle standard of the Marathas was flying from north to south , from east to west all over our glorious fatherland !

Jai bhawani, Jai Shivaji !!!

(via Shonan Talpade)

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10156237004323082&id=683703081

Monday, 5 June 2017

Leeches, Ayurveda and Dhanvantari

Initially I was interested in studying and knowing the iconography of the Deities. I was pulled towards the Vaishnava Iconography and started to read Vishnu Kosha by S.K Ramachandra Rao, Vaishnava Iconography in the Tamil country by R.Champakalakshmi, The Iconography of Vaishnava images in Orrisa by Thomas E Donaldson, Vaisnava Art and Iconography of Kashmir by Bansi Lal Malla and a few more book on ancient sculptures depicting Maha Vishnu. It was interesting to find that the sculptures of Vishnu from the Gupta period (320 AD) had His attribute Sudarshana Chakra personified as a short and stout person with a pot belly.   
 
While knowing about the different incarnations of Maha Vishnu and its iconography I was wondering why we normally mention the Dasavataras alone where only the 10 incarnation of Maha Vishnu mentioned. In fact at the time of Kurmavatara (Tortoise incarnation) Maha Vishnu came as Mohini (damsel who distributed the Ambrosia) and also the one who brought the pot of Ambrosia Dhanvantari (the celestial physician).

Though the tortoise incarnation became famous these two Mohini and Dhanvantari has not been talked about. The iconography of Dhanvantari is very interesting. He has four arms and in His upper right and left He holds the Sankha (Conch) and Chakra (Disc) respectively. In His lower left hand He has Amrutha Kalasha (pot of Ambrosia) and in His lower right He holds a Jaluka (Leech).    

Leeches are creepy worms found in marshy places. They are generally blood suckers but why would Dhanvantari hold it in His hand is the question?

Leeches came with Dhanvantari at the time of Samudra Manthana (churning of the ocean).  Ayurveda considers leeches to be the best to get the clotted blood out of the body. Leech therapy was used in ancient India when the soldiers in the war had the blood clot and in the reattachment of the severed limbs in the battle where the leeches were used periodically to suck the stagnant blood from the veins till it recovered. Amazing part is that the leech bite is not experienced as its saliva has anesthetic qualities; also it has enzymes and serums which stop blood from coagulating.

Recently allopathy is using leeches to treat varicose veins too. Leeches are given a wash in the water mixed with turmeric to make it sterilised and then they are left on the swollen veins to suck the stagnant deoxygenated blood in the veins.     

Ayurvedic practitioners say that using leeches on the diabetic patients can save them from the complications due to delay in healing of surgical wounds. It is said that the saliva from the leech is also used in cancer treatment and for cosmetic treatment too. One leech can suck blood up to ten times its weight. One section of sucking can make it sustain for several months. The leech grip is tight and it falls off on its own once it has had its stomach full of blood. There is no pain and the bites heal quickly too.

There are not many temples dedicated to Dhanvantari in North India but in South there are a few. Among the states in South India Kerala has many Dhanvantari temples. Off which the one in Nelluvaya, Thottuva, Koozhakottu, Anakkal, Maruthor Vattam, Prayikkara are most visited. This show how Dhanvantari and leeches are closely associated, we find more leeches in Kerala.  There is a Dhanvantari temple inside the famous Srirangam temple as well as Kanchi Varadaraja Temple.

Courtesy:
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1580597808626040&id=100000275079859

सांस्कृतिक भारत पर इस्लामी आक्रमण

संस्कृति का मानव सभ्यता से गहरा संबंध है। सभ्यता की आत्मा वहां की संस्कृति है। संस्कृति के खत्म होते ही सभ्यता का भी विनाश हो जाता है। इसका ज्वलंत  उदाहरण हमने यूनान, रोम और मिस्र आदि सभ्यताओं के विलुप्त होने में देख सकते हैं। लोग भले ही उन पुरानी सभ्यताओं में रहने वाले लोगों के ही वंशज हों, किन्तु आज वे सांस्कृतिक रूप से बिलकुल अलग हैं। इस प्रकार संस्कृति मानव सभ्यता की आत्मा है। वर्तमान समय के सभी वैज्ञानिक और तकनीकी उपलब्धियां इन पुरातन सभ्यताओं की ही देन है। विज्ञान, गणित व खगोल के लगभग सभी प्रारंभिक ज्ञान भारतीय, चीनी, यूनानी, एवं सभ्यताओं से लिए गए हैं।

वर्तमान समय में कई समृद्ध सभ्यताओं का वजूद खत्म हो गया है, और उनको समाप्त करने के पीछे संसार के दो सबसे बड़े इब्राहीमी पंथों – इस्लाम और ईसाई – के चरमपंथियों का सक्रिय योगदान है। इन पंथों की ऐसी प्रवृति के पीछे उनकी विस्तारवादी महत्वाकांक्षा है। इस्लाम और ईसाई के अलावा दुनिया के किसी भी पंथ में पूरी दुनिया का धर्मपरिवर्तन कराने का उद्देश्य नहीं है। मुरुभूमि में जन्में इन दो पंथों ने धर्म के नाम पर जीतने लोगों को मारा है, उतने लोग किसी भी विश्व-युद्ध, आकाल या महामारी में नहीं मारे गए। लोगों को मारने के साथ साथ इन्होने वहाँ की संस्कृति का भी समूल नाश कर अपने पंथ को स्थापित किया। जिस प्रकार इस्लाम में गैर-मुस्लिमों को ‘काफिर’ जैसे अपमानजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है, उसी प्रकार ईसाईयों द्वारा सनातन धर्मियों को ‘पैगान’ कह कर नीचा दिखाया जाता है। वास्तव में इन दो पंथो जैसा धर्मांध, असहिष्णु तथा विस्तारवादी विश्व में कोई अन्य पंथ नहीं है।

ईसाई मिशनरियों ने सबसे पहले यूरोप और उत्तरी अफ्रीका के समृद्ध सांस्कृतिक विविधता का विनाश किया जिनमें यूनानी, मिस्री, कैल्टिक, गोथिक, वाइकिंग और रोमा सहित सैकड़ों सभ्यताएं हैं। इन सभी लोगों को क्रूरतम तरीके से खतम किया गया। विद्वानो, दार्शनिकों, और कलाकारों को वीभत्स तरीके से मारा गया। मंदिरों और पुजा-स्थानों को अपमानित करते हुये निर्ममता से तोड़ा गया। यह विडम्बना ही है, कि जिन चमत्कारों के आधार पर यूरोप की लाखों महिलाओं को ईसाईयों ने जिंदा जला दिया, आज उन्ही चमत्कारों के आधार पर ईसाई पादरी को संत घोषित किया जाता है।

यूरोप की औपनिवेशवादी (colonist) ताकतों ने जब विश्व के तमाम हिस्सों में कब्जा करना शुरू किया तो उनके साथ चर्च की बर्बरता और सभ्यताओं का विनाश करने और इस कृत्यों को सही साबित करने का बहाना भी साथ था। दक्षिणी अमेरिका के माया सभ्यता और अटजेक सभ्यताओं का समूल विनाश करने का काम तो ईसाई मिशनरियों ने खुद स्वयं किया और वहाँ के मंदिरों से सोना, चाँदी व बहुमूल्य मूर्तिओं लूटा व मंदिरों को तोड़ दिया। इसी प्रकार मेक्सिको और उत्तरी अमेरिका के मूल इंडियन निवासियों की जनसंख्या और सभ्यता को भी विनष्ट किया गया। सभ्यता का ही बहाना बना कर यूरोपीय ईसाइयों ने ऑस्ट्रेलिया के मूल निवासियों (aborigines) को तो पूरी तरह से ग़ुलाम बना लिया गया और उनकी एक पूरी पीढ़ी को खतम कर दिया गया।

इसी प्रकार इस्लाम ने मोरक्को से ले कर भारत तक सभी देशों पर आक्रमण कर वहाँ के निवासियों को मुस्लिम बनाया, संपत्तियों को लूटा तथा इन देशों में पहले से फल फूल रही सभ्यता का विनाश लगभग नियमित अंतरालों पर किया। अरब आक्रमणकारी मुस्लिम ने बड़ी बेरहमी से ‘काफिरों’ का कत्लेआम किया। ईरान के पारसियों का खात्मा तो मात्र 15 सालों में कर दिया गया। तक्षशिला स्थित विश्व की प्रथम विश्वविद्यालय को तबाह कर दिया गया। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा जलाए जाने के बाद नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय महीनों तक जलता रहा।

बल-प्रयोग, कत्लेआम, लूट-पात और आतंक आदि तरीक़े जब नाकाफ़ी पड़ गए तो इस्लामिक षड्यंत्रकारियों ने काफिरों के खिलाफ अन्य गैर-युद्ध तरीक़े अपनाए। जिनमे से ‘धीम्मी’ और ‘अल-तकिया’ प्रमुख हैं। धीम्मी उन काफिरों को कहा जाता है, जो अपनी जान-माल और धर्म की सुरक्षा के लिए इस्लामिक राज्य को एक विशेष प्रकार का टैक्स देते हैं जिसे ‘जज़िया’ कहा जाता है। धीरे-धीरे धीम्मी लोग इस्लामिक ज़्यादतियों को जीवन का एक अभिन्न हिस्सा बना लेते हैं। भारत के अधिकांश भाग में  हिंदुओं को सदियों तक धीम्मी की तरह रहना पड़ा है। ‘अल-तकिया’ काफिरों के खिलाफ इस्लामिक जिहाद की दूसरी कारगर रणनीति है। यह तरीका छठें इममिया इमाम जफ़र-अल-सादिक़ (765 CE) के समय विकसित हुई। ‘अल-तकिया’ एक तरीक़े से मुस्लिमों के लिए काफिरों के खिलाफ जिहाद के लिए मक्कारी, धोखेबाज़ी और झूठ बोलने का इस्लामिक प्रमाणपत्र है। यह पूरे विश्व को मुस्लिम बनाने का इस्लामिक लक्ष्य का एक कारगर षड्यंत्र है। इसी तकिया नीति के अनुरूप झूठ बोल कर इस्लाम को शान्तिप्रिय धर्म बताया जाता है, काफिरों की लड़कियों को ‘लव जिहाद’ में फसाने के लिए झूठ का सहारा लिया जाता है तथा इस्लाम की सच्चाई को छुपा कर सूफी का अस्थायी चोला भी पहना जाता है।

ईसाई और मुस्लिम पंथों की विश्व विजयी महत्वाकांक्षा ने इनके आपसी संघर्ष को भी जन्म दिया है। विश्व के सैकड़ों संस्कृतियों का विनाश करने वाले ये प्रमुख पंथ आपस में भी एक दूसरे के खून के प्यासे हैं। अफ्रीका के कई देश मुस्लिम-ईसाई संघर्ष की आग में जल कर बर्बाद हो गए उनमें से नाइजीरिया, सुडान आदि प्रमुख है। इन पंथों के विस्तारवादी खूनी टकराव को सैमुअल हंटिंगटन ने अपनी पुस्तक ‘सभ्यताओं का टकराव’ में विस्तार से लिखा है। वास्तव में यह टकराव इन दो पंथों के बीच का ही है, जिसमें छोटी-छोटी किन्तु समृद्ध सभ्यताओं का नरसंहार हो रहा है।

भारत पर इस्लामी आक्रमण

सांस्कृतिक नरसंहार का सबसे बड़ा शिकार भारतवर्ष रहा है। सन 711 CE में सिंध में बिन-कासिम के आक्रमण, लूटपाट, कत्लेआम और हिन्दू मंदिरों को गिराने से मुस्लिमों का आक्रमण प्रारम्भ हुआ। फिर तो अनेकों इस्लामिक आक्रमण हुये, सबका उद्देश्य काफिर हिंदुओं को लूटना, मंदिरों को तोड़ना, स्त्रियों और बच्चों को दास बना कर ले जाना व बचे लोगों को मुस्लिम बनाना ही था।

मुस्लिमों द्वारा मारे गए हिंदुओं की संख्या के बारे में स्वामी विवेकानंद का एक व्याख्यान जो उन्होने अप्रैल 1899 में दिया था, का संदर्भ लेना उचित होगा। स्वामी जी ने कहा था, “सबसे पुराने मुस्लिम इतिहासकार फ़ेरिश्ता के अनुसार जब पहली बार मुसलमान भारत आए तब यहाँ 60 करोड़ हिन्दू थे, अब हम मात्र 20 करोड़ ही है।“  अर्थात, करोडों हिंदुओं को मुस्लिम शासकों और आक्रमणकारियों ने मार डाला। सन 1907 में स्वामी विवेकानंद की मृत्यु के बाद अविभाजित भारत के दंगों, मुस्लिम लीग के डाइरैक्ट एक्शन डे, नोआखाली, और भारत के विभाजन के दौरान लगभग 8-10 लाख हिंदुओं और सिखों का कत्लेआम कर दिया गया। किन्तु स्वतंत्र भारत के इतिहास की पुस्तकों में से इन तथ्यों को जान बुझ कर निकाल दिया गया है। आज की पीढ़ी के बच्चों को इन तथ्यों का जरा भी ज्ञान नहीं है।

आधुनिक इतिहास में ही 1947 के पश्चात मुस्लिमों ने पूर्वी बंगाल और पश्चिमी पंजाब के सभी हिंदुओं का समूल उन्मूलन कर दिया, प्राचीन हिन्दू मंदिरों और धरोहरों का विध्वंश कर दिया गया। आज भी बचे खुचे पाकिस्तानी और बंगलादेशी हिन्दू दहशत में जीते हैं। हर साल 300-400 हिन्दू लड़कियों का अपहरण कर जबरन धर्म परिवर्तन करा कर मुस्लिमों से शादी करा दी जाती है। पॅलेस्टीन की गाज़ा पट्टी की छोटी-छोटी छड़पों पर भारत में विरोध मार्च निकालने वाले तथाकथित सेकुलरों ने पाकिस्तान में हिंदुओं के सामूहिक नरसंहार, बलात्कार और सांस्कृतिक विनाश पर आज तक एक शब्द भी नहीं बोला है। वैसे ही जैसे सिरिया के यजिडी और अस्सरियन लोगों का इस्लामिक स्टेट द्वारा नरसंहार किए जाने पर भारत में कोई भी मार्च या सामूहिक निंदा नहीं की गयी।

जिस मुग़ल शासक को सन 1947 से अकबर महान कह कर स्वतंत्र भारत के स्कूलों में पढ़ाया जा रहा है, वह कहीं से भी अपने पूर्व के इस्लामिक धर्मान्ध शासकों से कम न था। उसने भी हिंदुओं पर अनेकों अत्याचार किए। जिसे जान बूझ कर छुपा दिया गया। पानीपत की दूसरी लड़ाई में हेमू को हराने के बाद अकबर ने उसका कटा हुआ सिर काबुल भिजवा दिया और बाकी शरीर को दिल्ली के पुराना किले के बाहर लटकाया गया| इसके उपरांत हेमू के सिपाहियों के कटे हुए सरों से एक ‘विजय स्तंभ’ बनवाया गया। चित्तौड़गढ़ पर विजय पाने के बाद अकबर ने 30,000 निहत्थे हिंदुओं को मौत के घाट उतरवा दिया। मुस्लिम इतिहासकार अब्द-अल-कादिर के अनुसार 1 रजब 990 हिजरी (सन 1582) को अकबर की सेनाओं ने कंगड़ा के पास स्थित नगरकोट में 200 गायों की बलि दी, अनेकों हिन्दुओं का कत्लेआम किया व वहाँ के सबसे बड़े मंदिर को तोड़ डाला।

“इस्लाम के सबसे बड़े नाज़िम को पता चला है की थत्ता, मुल्तान और विशेष रूप से बनारस में ब्राह्मण काफिरों द्वारा झूठी किताबों को उनके द्वारा स्थापित झूठे स्कूलों में पढ़ाया जाता है। शहँशाह औरंगजेब इस्लाम कायम करने को कटिबद्ध हैं और इसी क्रम में सभी रियासतों को यह हुक्म दिया जाता है कि काफिरों के स्कूलों और मंदिरों को गिरा दिया जाये, और काफिरों की तालिम और उनके मजहब को आम-ओ-खास से फौरी तौर पर हटा दिया जाए।“

चूंकि भारत में कोई केन्द्रीय सत्ता नहीं थी और छोटे राज्यों के पास अनेकों सेनाएँ थी, इस वजह से भारत को ईरान की तरह एक झटके में जीत कर इस्लामिक राष्ट्र बना देना संभव न हो सका। हिन्दू धर्म भारत के लोगों की जीवनशैली बन चुकी थी, जिसे बदलना आसान न था। तमाम अत्याचारों, जज़िया करों, यातनाओं के बावजूद भारत के हिंदुओं का धर्म-परिवर्तन उस प्रकार नहीं हो रहा था जैसा की अन्य देशों में हुआ।

अतः भारत के तत्कालीन मुस्लिम शासकों ने अल-तकिया रणनीति के तहत सूफियों का सहारा लिया। लगभग सभी प्रमुख हिन्दू तीर्थस्थानों के आस पास इन सूफी फकीरों के मज़ार बनाए गए। पुष्कर, त्रयंबेश्वर

साभार: https://m.facebook.com/1462945363727299/photos/a.1463037183718117.1073741828.1462945363727299/1470948999593602/?type=3

Sunday, 4 June 2017

A view of the Aryan, and druhyu migration

A view of the Aryan, and druhyu migration

By:  S Suchindranath Aiyer

"India is among the last surviving islands of Aryan culture. But Aryans did not originate in India. David Frawley has got it wrong. (His first two books on Ayurveda and Astrology were brilliant.)

How will you have archaeological proof of a nomadic, pastoral, multi racial people? Even after they integrated with the Druhyu (Dasyus) after the Civil War of Kurukshetra, whatever temples and universities they created were destroyed by Ashoka. The only proof is the oral tradition of the Shroutha Smartha Ithihasa that is corroborated by linguistic traditions and genetics found all over the world.

What is Aryan Invasion Theory? It seems to be something that Neo-Integrationists or, "GenNext" Jabberlal Neckscrews have drummed up as ar Redicsovery of India? I am classically educated in Sasnkrit and subscribe to Shrotuha Smartha Ithihasa. I personally think that those who have not had a classical Sanskrit education and are busy trying to remove the words Brahmin and Arya from the Indian dictionary or, to recast them in consonance with or in opposition to the Periyar-Ambedkar-Nehru-Gandhi-Imported Relgion-Communist consensus should not be tampering with the History of the Druido-Aryan civilization of the Indian Subcontinent.

All allusions to an Aryan Invasion theory are baseless because there could not have been any "invasion" when there were no "nations".. The intoxicating Soma integral to some Rik Vedic rituals is juice crushed from a creeper that grows along the highlands bordering the Aryan stamping grounds from East Prussia to Mongolia and is not available in the Indian sub continent. What does DNA prove? That there is no racial purity. Racial purity was never posited in the first place. The Shroutha Smartha Ithihasa states very clearly that after the Mahabharatha War, the Idolatrous, agricultural, temple worshipping Druids who originated in Mesopotamia and the Caucasian to Mongoloid nomadic, war like pastoral Aryas of the Eurasian steppes who had settled in the Indo-Gangetic Plain under the treaty of Bharatha, exacting tribute from the Druids, inter married after the Mahabharatha War and that the agricultural, architectural and temple worshipping methodologies entered the Vedas as the Aagama (that which came from outside) Shastras of the Atharva (the chronologically last or fifth) Veda. The Vedic Period that came to an end with Ashoka's fratricidal war and tyranny that put an end to the Treaty of Bharatha. Legends see many counter migrations out of what is now known as India. After the Mahabharatha War there was a great Exodus of Aryans from the Indo Gangetic Plain towards Europe with written Sanskrit. Sanskrit is still spoken in Lithuania but with an entirely different script and accent. After Ashoka's genocide and persecution of Brahmanism many went as far as the Urals and beyond while some, like Adi Shankara's ancestors, escaped to the deep South. Again during the Islamic invasions, many slaves were transported to the Middle East and Europe. The Romanis are descendants of those who escaped from Islamic slavers and plunderers. So, really given the time scale, the geographic scale and the many migrations inwards and outwards, what conclusive "scientific" proof is there? Precisely what does this prove or disprove? All available data fits in to the Shroutha Smartha Ithihasa and none contradicts it. THEORIES constructed out of selective or limited (in time and space) data contradict the Ithihasa. The earliest written (inscriptions) in Sanskrit are found in the remains of the Mitani Kingdom in Northern Syria (!500 - 1350 BC) in the Tigris-Euphrates Basin. Ofcourse, Sanskrit had NO written script in the nomadi,c pastoral Rik Vedic and Shukla Yajur Vedic Period when all knowledge was passed in the Shroutha (Heard) Smartha (remembered) tradition, but borrowed Devnagiri from a conquered Agricultural and Architectural civilization in the Krishna Yajur Veda Period. There is worship of theDruido-Aryan trinity in Yugoslavia since before the advent of Christianity there.

The Rik Veda evolved in the Aryan Grazing grounds between East Prussia and Mongolia. They had interactions with agricultural civilizations all around them and, therefore, cultural influence when they raided them for food during times of Kshama (scarcity) for themselves. The Druids of ancient Ur escaped their harrying as well as their own apostates who had embraced Yahweh and migrated all over. Some of them brought, agriculture, architecture etc (i.e. civilization) to the Indo-Gangetic Plains. Some Aryans followed them, conquering them during the Shukla Yajur Veda Period (invention of Archery, Chariot use in warfare). During the Krishna Yajur Veda Period, they settled under the treaty and laws of Bharatha. They exacted tribute from the Dasyus (Druids) in terms of agricultural and archtiectural produce and other forms of labour. This led to the decadence of the Sama Veda period. This led to the Mahabharatha War. This civil war broke Aryan hegemony giving rise to the Athrava Veda Period when the Dasyus and the Aryas inter married, the Shudra Varna entered the Guru Kulas and a great number of Aryas migrated back to their home lands and beyond. The Atharva Veda (Vedic period) came to an end when Ashoka destroyed the Druido-Aryan temples and dismantled the Gurukulas (thereby putting an end to Varna Mobility) in revenge for being declared an outcaste by the Supreme Council of Kashi when he contravened the treaty of Bharatha that established the consensus of Ashwamedha Yajna during the Krishna Yajur Veda period in place of the Rik Vedic Rajasooya where the heads of opposing kings are offered in the sacred fire by the victor. Ashoka waged war on his fellow Aryas (like the US waging war on NATO). At this time too a great number of Druido Aryas migrated to the North and the North West from India. Markers, there is no older structure than Saranath in Ashoka's former empire. The back lash to Ashoka's tyranny destroyed Budhism is India together withn the Ashoka Chakra with which Ashoka replaced the Swastika of Aryavartha Dharma whereas, Budhism prospers in South East Asia and Japan with the Swastika emblazoned on Budhist temples. Adi Shankara whose ancestors fled deep South to escape Ashokan persecution revived Sanskrit and the Brahma Sutras. .

“India is a complete mix of Asian and European genetic components. The Caucasus hunter-gatherer ancestry is the best match we’ve found for the European genetic component found right across modern Indian populations".

https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1491657744188714&id=100000335076770

फायदे का सौदा है प्रकृति में इन्वेस्टमेंट

फायदे का सौदा है प्रकृति में इन्वेस्टमेंट,

  मनीष चौधरी मेरे बचपन के एक दोस्त है।उन दिनो हम पूरे दिन साथ खेलते रहते थे।प्रायः हम साथ-खाते पीते भी रहते थे।हम उनके साथ उनके गाँव भी चले जाते क्योकि वह बगल में ही था।यह दिखता था कि वह औसत दर्जे से भी नीचे के परिवार से थे,जहां बड़ी किल्लत से गुजारा होता था।उनके बाऊ जी(पिताजी) खेती-बारी मजदूरी आदि करते थे।इसको लेकर उन्हें बड़ा काम्प्लेक्स रहता।थोडी-बहुत कमाई थी उसमें वह ईमानदारी से अपने एक बेटे और एक बेटी को पढ़ाते थे।जिले के स्थानीय स्कूल में हम साथ-साथ जाते।दयनीय हालत देखकर मुझे बहुत दया आती थी। वे दिन भर खेतों में खटते थे, और पढ़े-लिखे बिल्कुल नहीं थे।

  समय बीतता गया।यह मेहनती और पढ़ाई-लिखाई मे ठीक-ठाक थे।पढ़-लिख करके मुंबई में किसी कंपनी में गए।वहां उन्होंने कारोबार करना शुरू किया।चल निकला।फिर एक आईटी कंपनी डाली।आईटी कंपनी भी अच्छी-खासी चल रही थी।कुछ साल बाद किसी बड़े काम के चक्कर में मोटा लोन ले लिया।चुका नहीं पाए।पार्टनर ने लालच के चक्कर मे मोटा-घाटा करवा दिया।अचानक बर्बाद हो गए।सबकुछ बिक दिखा गया।आफिस,गाड़ी,बंगला,घोडा,प्लाट सब बिक गया।उसके बाद काम ढूंढने लगे।किंतु ऐसी मानसिक स्थिति आ गई थी,ऐसी अवसाद(डिप्रेसन) की स्थिति आ गई थी, कोई काम करने की मन:स्स्थिति ही ना बने।इस झटके ने बीमार कर दिया था।45 की उम्र के बाद एडजस्ट कर पाना थोड़ा मुश्किल होता है। जहां भी काम मिले कुछ ही दिनों में छोड़ना पड़े।

ऐसी ही स्थिति में एक दिन उनकी मुझसे भेंट हो गई।दिल्ली गया था और वहां फटेहाल, गंदे कपड़े पहने मनीष को देख कर मैं दंग रह गया।पहले मुझसे लगातार भेंट होती थी जब बहुत अच्छी स्थिति तभी मैंने देखा था।पिछले तीन-चार साल से मेरी परिस्थितिया भी कुछ ऐसी ही थी।इस वजह से भेंट नही हुई थी।छोटेपन से हमारी अच्छी-खासी दोस्ती रही है,पर जीवन की भागदौड़-आपाधापी...।मैं सहानुभूति से भर उठा।मैं उनको साथ ले आया अपने घर।काफी लंबी बातें हुई।"अब पत्नी और दो बच्चे भी है।अम्मा भी साथ रहती हैं।दिल्ली में किसी तरह गुजारा चल रहा है।बच्चो की पढ़ाई पत्नी की कमाई के सहारे चल रही है। मारा-मारा फिर रहा हूँ समझ में नही आता क्या करूँ,।मैं मदद करना चाहता था।उन्होंने बताया 2 करोड़ रुपए मिल जाएं तो काम नए सिरे से स्टार्ट हो सकता है।लेकिन दो करोड़ का लोन लेकर मै मदद करने की कोशिश करने लगा।मुझे नहीं मिल सका।मैंने पूछा घर से! उन्होंने कहा पिताजी को तो तुम जानते ही हो गांव पर रहते हैं।उनको मैं अपने साथ लाना चाहता था।लेकिन गाँव छोड़ना नही चाहते।लाख चिरौरी पर भी कभी हमारे पास रहने नही आये(मतलब मतभेद)।पढ़े-लिखे तो है नहीं। घर में इतनी कोई संपदा नहीं है।दूर-दराज देहात में सड़क से दूर 4 बीघे,सिंचित खेत हैं और उसको बेचने से भी कुछ नहीं होने वाला,।

  वह चले गए और उसके तीन-चार माह तक भेंट नहीं हुई।अभी 1 दिन पिछले साल की जुलाई में हम घर में बैठे थे।सामने से आते दिख गये।मैंने देखा सब गाड़ी,बंगला,कार सब लौट आया है। बड़े मजे में हैं।मन ख़ुशी से भर उठा।

  बताने लगे।हार कर मैं गाँव चला गया।गाँव के  घर में मैं अवसाद में इधर-उधर बैठा रहता।बाऊजी जी बूढ़े होकर अकेले गांव में मस्त रहते।अभी भी दिन भर खेत में जमे रहते।पहले महीनावार मैं जो पैसे देता था उसमे से भी पाई भर न खरचे थे।माई बाऊ जी को सब बता चुकी थी।शाम को खेत से काम करके लौटे थे।उस मकान में हम बैठे सोचते रहते थे क्या करें।उस दिन उन्होंने पूछा की क्या बात है?मैं ने मन ही मन सोचा ये क्या कर ही सकते हैं।फिर भी जाने क्यों  उस दिन मैंने बताया।  "ऐसे-ऐसे हो गया है, पैसे की जरूरत है, कुछ समझ में नहीं आ रहा क्या करें!,,उन्होंने कहा 'परेशान नहीं हो। मैं इंतजाम करता हूं,। मैं अवाक! फटेहाल आदमी 2-2 रुपए के महंगे, इन्होंने जिंदगी में जो भी कमाया हो इन 4 बीघे से क्या होता है।उन्होंने कहा 'चलो खेत चलते हैं।हम गये। बचपन में 40 साल पहले जब हम स्कूल जाते थे तो पिताजी ने खेतों के किनारे सागौन और शीशम के पेड़ लगा रखे थे।उस समय के प्रचलन के हिसाब से यूके लिप्टिस के पेड़ नही लगाए।अनपढ़ गवार थे,लेकिन समय की कीमत जानते थे। उन पेड़ों को पिछले 40 साल से लगातार देखभाल करते हुए कहीं नही गये।हष्टपुष्ट इन पेड़ों को देखकर मैं दंग रह गया।कुल 300 पेड़ थे।इतने मोटे-स्वस्थ और पके पेड़ थे बाजार में कोई भी कीमत मिल सकती थी।पूरा लकड़ी मार्केट खरीदने को तैयार। वन विभाग को ले-देकर के प्रति पेड़ डेढ़ लाख रुपए की बचत हुई।हमारे पास अब चार करोड़ रुपए से भी अधिक थे। मेरी आंखों से आंसू बह रहे थे। किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि मेरे पिता ने 40 साल पहले जो इन्वेस्ट किए थे वह इतनी बड़ी रकम दे जाएंगे कल्पना से परे था।हमने दो करोड़ से काम शुरू किया।डेढ़ करोड़ की वही जमीन खरीद कर फिर से पेड़ लगा दिया। अब मैं बचा हुआ समय गांव-गांव घूम-घूम करके पेड़ लगवाने का काम करता हूं। किसानों से फलदार पेड़ लगवाने पर जोड़ देता हूं।बड़ा फायदेमंद काम है।अगर दो सौ फलदार पेड़ तैयार हो गए तो समझो 3 लाख सालाना घर बैठे देते है,,।

  इंवेस्टमेंट कि यह थ्योरी जो हमने किताबों में भी नहीं पढ़ी- नही कभी सोची थी।एक अनपढ़,गरीब छोटा किसान आज के 40 साल पहले इतना समझ सकता था।अपने बाऊ जी की दूरदर्शिता पर मुझे गर्व है।इन्वेस्टमेंट के बारे में हमारी समझ वाकई कम है।हालांकि वह वही गांव में ही रुक गए, वहां से मेरे साथ आना नहीं चाहते थे।लेकिन प्राकृतिक जीवन की यह मर्यादा देखकर मेरी सोच-समझ और व्यक्तित्व ही बदल गई।अब हम ज्यादातर गाँव में ही रहने लगे है।पत्नी बच्चे भी बाऊजी के पास ज्यादा समय बिताते है।मेरा आफिस और मुख्यालय वहीं है,भले ही रजिस्टर्ड कही और से है।अब मैं आईटी कंपनी नहीं चलाता बल्कि सीड्स कंपनी चलाता हूं और मैं चाहता हूं हमारा देश हरा भरा हो।बच्चो के हरियाले भविष्य के साथ।हम पेड़ लगाते हाँ और अंदर तक शांति हासिल करते है।
(चूंकि वह नाम किसी कारणवश यहाँ जाहिर नही करना चाहते।इसलिए उन्हे मेंशन नही किया।वह इसी लिस्ट मे है)

  हममे से अधिकांश लोग जीविका की खातिर शहरो मे रहने आ गए हैं।जून,जुलाई मे ही पेड़-पौधे लगाये जाते है।गाँव जाईये,यदि दो-चार बीघा जमीन है।जाहिर है आप यहाँ है तो गाँव मे बिना उपज के पड़ा होगा।कुछ धरती माता पर इन्वेस्ट करिये,उसमे पेड़ लगवाइए,सागौन,शीशम,साखू,चन्दन या खैर जैसे कीमती वृक्ष प्रकृति की रक्षा तो करेंगे ही आपके बच्चों का भविष्य भी सुरक्षित कर देंगे।यदि फलदार पेड़ो का एक भी बाग तैयार हो गया तो शांति  सुकून,स्वास्थ्य के साथ-साथ धरती-प्रकृति,पानी और जीवन भी बचा ले जाएंगे।उससे मिले ऑक्सीजन,हरियाली आदि सारी कीमत जोड़ी जाए तो करोड़ो रुपए तो मुफ्त मे ही मिल जाएँगे।

नोट-पर्यावरण दिवस पर विशेष।

(कल पढ़े 'दिल्ली दिल वालो की,यह लेख प्रकृति पर है न की इतिहास पर)

साभार: पवन त्रिपाठी, https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10155276488286768&id=705621767

खंडन, वैश्या_के_यहां_की_मिट्टी_का_माँ_दुर्गा_की_मूर्ति_बनाने_में_प्रयोग

#खण्डन --- - #वैश्या_के_यहां_की_मिट्टी_का_माँ_दुर्गा_की_मूर्ति_बनाने_में_प्रयोग - कई दिनों से एक अमर्यादित पोस्ट देखने को मिल रही थी जिसमे...