Wednesday, 30 August 2017

वीर धरावर्षा परमार की गाथा

©Copyright मनीषा सिंह बाईसा (क्षात्र कन्या) जगह मेवाड़ / मेड़ता, राजपुताना राजस्थान की कलम से ।
भारत के इतिहास की अनूठी विशेषता है, उसका अपना अनूठा और विशिष्ट दृष्टिकोण है-जिसे केवल तीन शब्दों में प्रकट किया जा सकता है-'विजय, वीरता और वैभव का इतिहास।'
इतिहास की इसी विशिष्टता को हमारे कितने ही महापुरूषों ने और क्रांतिकारी इतिहास पुरूषों ने समय-समय पर वैशिष्टय प्रदान किया और उसके अनूठेपन को और भी अधिक धार दी।

वीर धरावर्षा परमार की गाथा जिससे क़ुतुबउद्दीन ऐबक का घोड़ा भी डरता था जिसने भारतीय इतिहास के उन चुनिन्दा लोगों में से हैं जिन्होंने इतिहास की धारा मोड़कर रख दी। वीर धरावर्षा परमार विद्युत की भांति चमके और दैदीप्यमान हुए । चंद्रवाती अबू पर धरावर्षा परामार का शासन था (चन्द्रावती नगरी राजस्थान के प्रसिद्ध दर्शनीय स्थल माउण्ट आबू से 6 किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण में है। ) विद्धानों के अनुसार चन्द्रावती नगरी परमार राजाओ के शासनकाल के समय राम जी के अवध नगरी के समान वैभवशाली था । चन्द्रावती के आस-पास के खण्डहरों को देखकर डॉ. भण्डारकर ने यहाँ परमार शसाकों द्वारा बनाये गए कम से कम 360 मंदिरों के अस्तित्व की सम्भावना व्यक्त की है।
धरावर्षा परमार की वीर गाथा-:
जिस समय भारत की स्वतंत्रता को नोंच-नोंचकर खाने वाले तुर्की भेड़ियों के झुण्ड के झुण्ड भारत भूमि पर टूट -टूटकर पड़ रहे थे और उन्हें यहां से उड़ाकर बाहर करने के लिए भारत की तलवार अपना पूर्ण शौर्य और पराक्रम दिखा रही थी, उस समय उन भेड़ियों के पाव उखाड़ फेंकने को जन्म लिये थे वीर धरावर्षा परमार ।
सन ११९६ ई. (1196 A.D) स्थानीय राजपूत प्रजाओं ने तुर्क आक्रमणकारी कुतुबुद्दीन ऐबक को खदेड़ने के लिए अपने वीर राजा धरावर्षा परमार की सहायता के लिए एकजुट हो गए ये एक बहोत छोटे से राज्य का राजा थे इसलिए सैन्यबल अत्यधिक नही थे परन्तु तुर्क लूटेरों को अच्छे से ज्ञात था एक राजपूत सौ को मार कर अमर होता है इसलिए जब भी ये भारतवर्ष पर आक्रमण करते थे इनकी सैन्यबल लाख नही तो लाख संख्या के आसपास तो होता ही था ।  कुतुबुद्दीन ऐबक अपने सेनापति खुसराव खां को चन्द्रावती पर आक्रमण करने का विशेष दायित्व सौंपा गया खुसराव खां को  । धरावर्षा के साथ केवल ३२०० (3200) पैदल सैनिक एवं १२७५० (12750) अश्वोरोही सैन्यबल साथ ही हज़ारों राजपूत प्रजा भी सैनिक की भूमिका निभाए थे और साधारण राजपूती प्रजाजन से निर्भीक योद्धा बन गए यही तो खासियत हैं राजपूतों की मातृभूमि को संकट में देख बच्चा बच्चा महाकाल का स्वरुप बनकर काल का संहार करता हैं ।

“धरावर्षा परमार की युक्ति और नीति ने हिंदुत्व की पराजय को विजय में बदल दिया”-
धरावर्षा परमार घात लगाकर कर युद्धनीति प्रणाली के जनक थे जिसे आज के युग में (Ambush War) कहते हैं । महाराज धरावर्षा को ये बात भलीभांति ज्ञात था सीधा हमले से रण में पराजय निश्चित हैं क्योंकि खुसराव खां के पास अत्यधिक सैन्यबल था अंतत आबू पर्वत की घाटिओं का सहारा लेकर युद्ध करना उच्चित समझा और सैन्यबल एवं प्रजाओं के साथ पहाड़ियों में धनुर्धारी सैन्यबल घात लगा कर बैठे रहे, महाराज धरावर्षा परमार के इशारा मिलते ही बाणों की वर्षा कर तुर्कों की सेना में हलचल मचा दिया गया । खुसराव खां बाणों की प्रहार किस दिशा से हो रही हैं ये समझ नही पा रहे थे क्योंकि बादल से घिरे हुए पर्वतमाले की घाटियों में घात लगाकर बैठे अत्यल्प सैनिकों के बल ने तुर्क सेना की विशाल सेना को असमंजसपूर्ण स्थिती में डाल दिया तुर्कों की सेना इस भ्रम में रहने लगे की राजपुताना की सैन्यबल उनसे ज्यादा हैं खुसराव खां कुछ समझ पाते राजपूत रणबांकुरों की बाणों की वर्षा से मुर्छित होकर खुसराव खां हाथी से गिर गया । राजपूतों की बाणों की वर्षा से आकाश की ओर दृष्टि करने पर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि वहाँ पर केवल बाण-ही-बाण हैं और कुछ नहीं है । युद्धभूमि खून से रंग गई तुर्क सेना में हाहाकार मचा कर रख दिया था मुट्ठीभर राजपूतों ने पराजय को विजय में बदल दिया । 
खुसराव खां , की मृत्यु के पश्चात तुर्क सेना को वापस तुर्क बुला लिया क़ुतुबुद्दीन ऐबक ने क्योंकि मोहमम्द गोरी द्वारा १८ वर्ष पहले की गयी भूल को दोबारा दोहराना नही चाहता था जिससे उसका भी प्राण ठीक वैसे जाता जैसे गोरी का संहार हुआ था राजपूती तलवार का स्वाद हर तुर्की हमलावरों ने चख के रखा हुआ था, ऐबक भारतवर्ष की धरती से कई वर्षो तक दूर रहा ।    

हमें राजपुताना के इतिहास पर गर्व है,
क्योंकि यह शौर्य का पर्व है
काल के कपाल पर
वीरता के भाल पर
यह शौर्य का सूर्य है
यह गौरव का पुंज है
और तेज का निकुंज है
पौरूष इसका धर्म है,
हमें अपने राजपुताना पर गर्व है।
जय एकलिंगजी ।। 🚩🚩
जय जय क्षात्र धर्म ।। 💪💪 🚩

वड पोहो भो परमार वंश , आहव वीर अभंग !!
नृप उज्जैणी नगर रा , राव सुन्धवा रंग !!१!!
पर दुख भंजण पराक्रमी , दिपयो दनी देवंग !!
कश्मीर दत किनी कवियां , राजा विक्रम रंग !!२!!
धारा नगर दाता धणी , आंणे चीत उछरंग !!
पयंपया दान परमार पत , राजा भौज सु रंग !!३!!
नृपत वीर पारी नगर , हंसराज वड हाथ !!
वंकम दत अधको वदां , निडर कलिन्जर नाथ !!४!!
आल पाल अर्बुदगिरी , जबर सेन भट जंग !!
व्रविया दत परमार वड , राखयो जस घण रंग !!५!!
जोगराज जबरो भयो ,धर्मातम धर धाट !!
उणने प्रात रंग अपूं , नीति युत शुद्ध नराट !!६!!
पोहो रंग परमार पति , मर्द वीर मन मोट !!
धरणी वराह मरूधरा , किया वंट नव कोट !!७!!
त्यागे राज वैभव तणो , तुरत मन मोह तुरंग !!
भूप गोपीचन्द भरथरी , राज योगेसर रंग !!८!!
देश पारकर दिपयो , पुरण ग्रही प्रतंग !!
करोड़ बगस दांतण कियो , राजा चंदण रंग !!९!!
परमार वंसी पराक्रमी , नृप दाता नवडंग !!
उतबंग दियो उतार नीज , राजा जगदे रंग 1!!१०!!
गवराया जस गीतड़ा , अमर सु नाम उतंग !!
पौहव धन्न पाराकरा , रांणा काछब रंग !!११!!
शरणागत तीतर साटे , जुड़े चभाड़ां जंग !!
वीर मुंजा पकमार वर , रतन सु नंदन रंग !!१२!!
जुने शरणे राखयो जीहि , जुड़े सुमरां जंग !!
लड़या हालो लगधीर सुं , राजन मुळी रंग !!१३!!
मांगयां सौ द्ये मांगणां , पाळी भूप प्रतंग !!
दियो शेर दत दुथियां , राजन मुळी रंग !!१४!!
टीबे धाड़ टिकर तणे वाळण धेन वितंग !!
शिर पड़ियो लड़ियो सिरे , राव वरणुवा रंग !!१५!!

साभार: https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1902888163366357&id=100009355754237 and comment there in by Rajendra Singh Rathore.

Monday, 28 August 2017

अब केवल राम, रहीम रूपी सेकुलर प्रक्षेप की आवश्यकता नहीं

'अब केवल राम,

  राम-रहीम  नेहरुआना सेकुलरिज्म के ढोंग का सबसे बड़ा प्रतीक है।इन 70 सालों में बनाया गया किला आज ढह रहा है और हम चाहेंगे यह जड़ से समाप्त हो जाए।सेखुलरिज्म के रूप में बनाया गया यह अनकल्चर एक तरह से गंगा-जमुनी रूप इस तरह ढाला गया है कि अपराधी,ढोंगी,लुटेरे समाज को भ्रमित करके ऊंची जगह पहुंच जाएं।आप ध्यान से देखें तो यह एक पार्टी विशेष से जुड़े लोग है।वे लगातार परवर्ती सरकारों द्वारा संरक्षित किये गए थे।

सन्त पहचानना भी एक सिद्धि है।रामकृष्ण परमहंस,विवेकानन्द,महर्षि रमण,गोपीनाथ कविराज,मास्टर जी, मछेन्दर नाथ ,गोरख नाथ , सन्त ज्ञानेश्वर , संत तुकाराम, संत एकनाथ , संत जलाराम, रामकृष्ण परमहंस, संत रैदास, तुलसी दास, सूरदास , आदी शंकराचार्य ,बाबा कीनाराम , तेलंग स्वामी , देवरहा बाबा ,स्वामी करपात्री ,त्रिदंडी स्वामी,दतिया स्वामी आदि-आदि हजारो सन्त,लाखो योगी,अनगिनत महान और सिद्ध महात्मा इस देश में पैदा हुए , चमत्कारिक शक्तियों से सभी भरे हुए थे।सब ने देश को नयी दिशा दी।सबके लाखो ,करोडो अनुयायी थे ,गुरु की संस्कार युक्त ,देशभक्त व्यक्तिव वाले।सनातन समाज मे यह आस्था हजारो साल के त्याग से उत्पन्न हुई है।वह समाज के मूलाधार बन गए थे।उनको ध्यान से पढ़े वे सभी 10वी शताब्दी के बाद के हैं।उनमें से कोई भी सेकुलरिज्म की छौंक नही लगाता।हालांकि वंशवादी कॉन्ग्रेसी चापलूसों ने बहुत कोशिश की उनके उपदेशों को कन्फ्यूज करने की पर सफल नही हो सके।उनकी वजह से 700 साल तक लगातार प्रयास के बावजूद न मुस्लिम सफल हुए न ईसाई।लेकिन कांग्रेस का प्रयास मूलाधार पर ही था।उपरोक्त सभी संतो की तस्वीर देखे सब का पहनावा,बोली,आचार,जीवन शैली,व्यवहार सादगी भरा था ,तैलंग स्वामी तो काशी में नंग धडंग रहते थे ,करपात्री जी एक बार दोनों हाथ को जोड़ कर जो भिक्षा में मिलता उसी से गुजरा कर लेते थे।इनमे से सभी संत सादगी में जिए सादगी में मरे।किसी ने अपना कोई आर्थिक साम्राज्य नहीं बनाया न ही अपने रिश्तेदारों को उत्तराधिकार दिया।

  अब आईये निर्मल बाबा , रामपाल ,धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ,चंद्रास्वामी , राधे माँ  ,गुरमीत सिंह,साईं, और  एक राजनीतिक जयगुरुदेव के हजारो करोड़ का आश्रम जिसे एक ड्राइवर ने कब्जा लिया,साधको के हिस्से कुछ नही आया।युवक कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बाकायदे मुकदमा जितवाकर एक शंकराचार्य बनवाये गये।हजारों प्राचीन मठो,मन्दिरो और आश्रमो,के साथ अखाड़ों पर भी ढोंगी सनातन विरोधी बाबा के रूप में काबिज है।यह हिंदू मान बिंदुओं पर सोची-समझी साजिशी हमले थे।आजकल सैकड़ो की संख्या में मठाछारी, टीवीबाज बाबाओ के पास किसी के पास मच्छर मारने की भी सिद्धि नहीं है।न ही साधना या तपस्या का कोई रिकार्ड है।बस महिमाण्डन और ठगी-सेखुलर विद्या के सहारे मौज मारे चले गए।उनकी योग्यता इतनी ही है कि वे तमाम समाजवादी,कॉन्ग्रेसी,या कम्युनिष्ट के निकतत्स्थ हैं जो छद्म-धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिंदूत्व में कमी निकालते रहते है और परकीय मजहबो की बड़ाई करते रहते है।सबके सब अथाह सम्पति के मालिक बने।किसी ने समाज देश को सही दिशा नहीं दी। बेवकूफ लालची गरीब ,अमीर लोगो को गुमराह कर अपना उल्लू सिद्ध किया।इनको यहां तक कौन लाया जरा सोचिये।इन सत्तर सालों में बड़े तरीके से ठगों को सनातन समाज पर स्थापित करने का प्रयत्न किया गया।

जनता इन ढोंगियों के पास केवल धन ,बैभव,भौतिक उन्नति की लालसा में जाने लगी न कि अध्यात्म पाने।ये कालनेमि किसी सड़क छाप जादूगर की तरह भव्य वैभव से आम जनों को सम्मोहित कर उल्लू बनाते रहे,बस एक प्रकार का सामूहिक सामुदायिक भाव इससे ज्यादा कोई जुड़ाव नहीं।जैसी प्रजा होगी वैसे ही समाज की स्थापना होगी।जाकिर नाईक ,बरकाती , अंसार राजा ,इमाम बुखारी जिनके पाक है या नापाक उनके साथ कोई मुकदमे द्वारा बना शंकराचार्य,कोई त्यागी,कोई पकौड़ीलाल,त्यागी टाइप के अवतारी भी जगद्गुरु घोषित होने लगे।संगठित समाज न होने की वजह से इनसे बचने का कोई रास्ता बनाना सम्भव ही नही था।

   यह राम,कृष्ण,गौतम,महावीर,नानक,गुरु गोविंद सिंह की संतान और परंपरा वाले लोग हैं, ,अगस्त्य ,भारद्वाज ,अत्रि , बिस्वामित्र ,बसिष्ठ की खोज करें।यह चैतन्यानंद,योगियों,तत्वविदों,परानुभूति-सम्पन्नों,ज्ञानियों,हंसो,परमहंसो,उच्च ईश्वरीय अनुभूतियों,तुरीयावस्था तक पहुंचे महात्माओं,योगियों,सन्तो की धरती है।यह पुण्यभूमि है।इसे समाप्त करने की साजिश् चल रही है।
धर्म को नष्ट करने के कितने षड्यंत्र चल रहे है।संतों को बदनाम करने का तरीका निकाला गया है।उनके प्रति आस्था को नष्ट करने के गहरे दूरगामी वैश्विक षड्यंत्र किये गए हैं।उसमे बड़े लोग शामिल है।जिन्हें भारत की सनातन व्यवस्था को किसी भी तरह खत्म करना है

   आज भी बहुतेरे सिद्ध-महात्मा है जो निष्कामी है।आशीर्वाद नहीं बाटते,झोपडी और कंदराओ में है।अर्ध नंग और पुरे नंग है।दूर दराज की पहाड़ियों,गांवों,जंगलों में रहते है।असल तपस्वी प्रचार लिप्सा,लोक लिप्सा से दूर ईश्वर-प्रणिधान में लगे हैं।उनकी शक्ति से,उनकी साधना से यह पुण्य-भूमि भारत बचा है किसी अय्याश,रंगीले ढोंगी-बालात्कारी टीवीबाज के बड़-वचनों से नही।

   देश के बंटवारे के बाद मौलिक सांस्कृतिक धारणाओं वाले सन्तो को इग्नोर करने की इस प्रवृत्ति के प्रतीक का ढह जाना जरूरी है।निश्चित ही यह सनातन के महान प्रतीको को,महान स्वरूप पर, महान प्रकृति पर,महान चित्र पर,चरित्र और स्वरूप पर लगातार वार करता रहा है।राम-रहीम,राम-रहमान,गंगा-जमुनी कहकर सनातन मूल समाज को कन्फ्यूज स्यूडो-सेखुलिरिज्म का यह जाल आज टूट रहा है।

असल मे सेखुलरिज्म एक 'अननेचुरल वाद, है जिसे एजुकेशन के मॉध्यम से,फिल्मों से,मीडिया से,सिनेमा से, साहित्य से भारतीय समाज पर थोपा गया है।ऐसे पाखंडियों का महिमामण्डन करके ही कॉन्ग्रेसी 70 साल तक शासन में रहे थे।वास्तव में कुछ पेशेवर तार्किक,सरकारी इतिहासकार,साहित्यकारों ने त्याग,तपस्या और साधना,संयम के बजाय स्युफिज्म-स्युडिज्म पर जोर देकर सन्यास के प्राचीन फ्लो को नष्ट करना शुरू कर दिया।उसके पीछे की दुर्भावना नेहरुआना हिंदू विरोधी सोच थी।सेकुलरिज्म के चलते वे भूल गए कि दूसरे मजहबों(जिनकी आस्था भारत भूमि में नही है न ही वे यहां पैदा हुए हैं)में सेक्स,त्याग,और तपस्या की अवधारणाएं भिन्न है।उनका दूसरा उद्देश्य धर्मान्तरण का माहौल बनाना भी था।जिसका आंतरिक उद्देश्य यह था कि सारे 'मजहब एक समान है,यह प्रचारित करना था।इस सोच का घटिया नतीजा राम-रहीम, साईं, आदि के रूप में सामने है।

  बेसिकली भारत मे 'संतत्त्व,बहुत ही सज्जनता,शालीनता से प्राकृतिक भारत के ज्ञान का प्राकृतिक स्वरुप है।वह ज्ञान,तप,संयम,निष्काम जीवन का प्रतीक है।सेखुलरिष्ट बाबा-वाद ने प्राचीन स्वरूप का,भारतीय संस्कृति का,भारतीय समाज का,भारतीय व्यवस्थाओं का,भारतीय परंपराओं का,भारतीय जीवन शैलियों, का हिंदू प्रतीकों को जितना नुकसान किया है उतना किसी भी सामाजिक आक्रमण ने नही किया।(पढ़ें मूलाधार पर हमले-भाग-1-2)कोई रामपाल हो,कोई राम-रहीम हो,कोई बंदा कोसरिया हो,कोई साईं हो,कोई राधे माँ हो इस तरह के गंगा-जमुनी के नाम पर हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर,तुस्टीकरण के लिए जो धमाल-मिक्स कल्चर लेकर आते हैं।वह एक-तरफा सनातन समाज को बर्बाद करता है।

आप ध्यान से दिखियेगा इनमे से बहुत से अपराधी कैसे बड़े बन जाते हैं।वे शुरुआत से ही ढोंगी होते है।वे किसी न किसी नेता(कांग्रेस के निकट होते हैं) को पकड़ते है या उसके द्वारा पोषित होते है।वे जैसे भी होते हो किंतु पैसा बटोरने-हथियाने का काम करते हैं।वे भव्यता की स्थिति बना ले जाते हैं।आप उनके रिश्तेदार,निकटस्थ,सम्बंधित लोगो पर नजर रखे सारा रहस्य खुल जायेगा।प्राचीन-प्राकृतिक सलीका तपस्या,योग,ध्यान,साधना,सेवा,त्याग,अहिंसा,नैष्कर्म्य जीवन-पद्धति तमाम पूजा-पद्धतियां छोड़ कर के अपना धंधा चमकाने में लग जाते हैं।वे कदापि सन्त नही है।आप थोड़ा गौर से देखेंगे कि इसकी परम्परा कहां से शुरू हुई।क्योंकि ब्रम्हचर्य के साथ जिसके प्रयोगों ने इस तरह के ठगों को मान्यता देना शुरू कर दिया था।यह एक तरह से अनैतिकता को सरकारी मान्यता जैसी थी।

अच्छा होगा कि राम-रहीम जैसो को फांसी जैसी सजा दी जाए जिससे इस तरह का सेखुलर-वाद नष्ट हो।नाटकी सेकुलरिज्म पूर्ण तौर पर भारत से नष्ट हो और प्राचीन भारतीय सनातन शैली उदित हो।जिसमे त्याग,तपस्या,संयम, ब्रम्हचर्य,योगादि ऊंची साधनाएम,ऊंचे आदर्श भारतीय समाज में पुनः प्रस्थापित हों।यह इस तरह की अप्राकृतिक धारणा बनाकर इन वर्षों के शासन ने समाज मे वह चीजें स्थापित करने की कोशिश की थी जो भारत-भूमि का लगातार नुकसान कर रही थी।कुल मिलाकर राम-रहीम,रामपाल,निर्मल जैसो की सजा हमारे सनातन समाज के लिए अच्छे सिम्टम्स है,जल्द ही इसी बहुत सारा कूड़ा और साफ हो जाएगा। शायद मोदी के आने के साथ ही परम-चेतना भी जाग गई है जो इस तरह के लोगो को ढूंढ कर सजा दे रही है।अब केवल 'राम, कोई रहीम नही।जागृत और पूर्ण परम् वैभव युक्त हिंदू राष्ट्र शांत वसुधैव कुटुंब सफल होगा।

साभार: पवन त्रिपाठी, https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=10155549545841768&id=705621767

Sunday, 27 August 2017

26 अगस्त- पवित्रता की सर्वोच्च पराकाष्ठा माँ पद्मावती "जौहर दिवस"

26 अगस्त- पवित्रता की सर्वोच्च पराकाष्ठा माँ पद्मावती "जौहर दिवस"
भारत की नारियों का वो स्वरूप और पवित्रता की वो पराकाष्ठा ही ये जो संसार में हर सर को भारत की नारियों के सम्मान में झुका गया था . वो सर आज भी झुका है भले ही अपना ईमान और कलम एक ही परिवार में बेच चुके चाटुकार इतिहासकार कुछ भी लिख लें और कुछ भी कह लें पर क्रूरतम इस्लामिक आतंक से लड़ कर तन और धन के भूखे
जौहर की गाथाओं से भरे पृष्ठ भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं। ऐसे अवसर एक नहीं, कई बार आये हैं, जब हिन्दू ललनाओं ने अपनी पवित्रता की रक्षा के लिए 'जय हर-जय हर' कहते हुए हजारों की संख्या में सामूहिक अग्नि प्रवेश किया था। यही उद्घोष आगे चलकर 'जौहर' बन गया। जौहर की गाथाओं में सर्वाधिक चर्चित प्रसंग चित्तौड़ की महारानी पद्मिनी का है, जिन्होंने 26 अगस्त, 1303 को 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। माँ पद्मिनी का मूल नाम पद्मावती था। वह सिंहलद्वीप के राजा रतनसेन की पुत्री थी। एक बार चित्तौड़ के चित्रकार चेतन राघव ने सिंहलद्वीप से लौटकर राजा रतनसिंह को उसका एक सुंदर चित्र बनाकर दिया। इससे प्रेरित होकर राजा रतनसिंह सिंहलद्वीप गया और वहां स्वयंवर में विजयी होकर उन्हें अपनी पत्नी बनाकर ले आया। इस प्रकार माँ पद्मिनी चित्तौड़ की रानी बन गयी। वो रानी जिनके चरित्र और शौर्य के आस पास भी सोचने की क्षमता ना रखने वाले तथाकथित स्टार उनके जीवन पर फिल्म बनाने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं .
माँ पद्मिनी की सुंदरता की ख्याति अलाउद्दीन खिलजी ने भी सुनी थी। वह उसे किसी भी तरह अपने हरम में डालना चाहता था। उसने इसके लिए चित्तौड़ के राजा के पास धमकी भरा संदेश भेजा; पर राव रतनसिंह ने उसे ठुकरा दिया। अब वह धोखे पर उतर आया। उसने रतनसिंह को कहा कि वह तो बस माँ पद्मिनी को केवल एक बार देखना चाहता है। रतनसि उसे छोड़ने द्वार पर आये। इसी समय उसके सैनिकों ने धोखे से रतनसिंह को बंदी बनाया और अपने शिविर में ले गये। अब यह शर्त रखी गयी कि यदि माँ पद्मिनी अलाउद्दीन के पास आ जाए, तो रतनसिंह को छोड़ दिया जाएगा। यह समाचार पाते ही चित्तौड़ में हाहाकार मच गया; पर माँ पद्मिनी ने हिम्मत नहीं हारी। उसने कांटे से ही कांटा निकालने की योजना बनाई। अलाउद्दीन के पास समाचार भेजा गया कि पद्मिनी रानी हैं। अतः वह अकेले नहीं आएंगी। उनके साथ पालकियों में 800 सखियां और सेविकाएं भी आएंगी।अलाउद्दीन और उसके साथी यह सुनकर बहुत प्रसन हुए। उन्हें माँ पद्मिनी के साथ 800 हिन्दू युवतियां अपने आप ही मिल रही थीं; पर उधर पालकियों में माँ पद्मिनी और उसकी सखियों के बदले सशस्त्र हिन्दू वीर बैठाये गये। हर पालकी को चार कहारों ने उठा रखा था। वे भी सैनिक ही थे। पहली पालकी के मुगल शिविर में पहुंचते ही रतनसिंह को उसमें बैठाकर वापस भेज दिया गया और फिर सब योद्धा अपने शस्त्र निकालकर शत्रुओं पर टूट पड़े। कुछ ही देर में शत्रु शिविर में हजारों सैनिकों की लाशें बिछ गयीं। इससे बौखलाकर अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ पर हमला बोल दिया। इस युद्ध में राव रतनसिंह तथा हजारों सैनिक मारे गये। जब महारानी माँ पद्मिनी ने देखा कि अब हिन्दुओं के जीतने की आशा नहीं है, तो उसने जौहर का निर्णय किया। रानी और किले में उपस्थित सभी नारियों ने सम्पूर्ण शृंगार किया। हजारों बड़ी चिताएं सजाई गयीं। 'जय हर-जय हर' का उद्घोष करते हुए सर्वप्रथम वीरांगना महारानी माँ पद्मिनी ने चिता में छलांग लगाई और फिर क्रमशः सभी हिन्दू वीरांगनाएं अग्नि प्रवेश कर गयीं। जब युद्ध में जीत कर वो क्रूर लुटेरा अलाउद्दीन माँ पद्मिनी को पाने की आशा से किले में घुसा, तो वहां जलती चिताएं उसे मुंह चिढ़ा रही थीं।
पवित्रता की उस चरम पराकाष्ठा , त्याग की उस सर्वोच्च प्रतिमूर्ति महारानी पद्मावती को आज उनके बलिदान अर्थात जौहर दिवस पर सम्पूर्ण सुदर्शन परिवार का बारम्बार नमन , वन्दन और अभिनन्दन है साथ ही ऐसी देवीस्वरूपा महारानियों की गौरवगाथा को सदा सही रूपों में जन मानस के आगे लाने के लिए अपने पुराने संकल्प को भी दोहराता है ..
सुंदरता खुद जिससे मिलकर, सुंदरतम हो आई थी।
जिसके मन मंदिर में अपने, पिय की शक्ल समाई थी।
शील, पतिव्रत की दुनिया को, जिसने सीख सिखाई थी।
जौहर की ज्वाला में जलकर, जिसने जान लुटाई थी।
सदियों के गौरव को जिसने, अम्बर तक पहुंचाया था।
स्वाभिमान को शक्ति देकर, खिलजी से भिड़वाया था।
जीते जी राणा को चाहा, और चाह ना उसकी थी।
सत-पथ पे चलती थी हरदम, सत पे जीती मरती थी।
चित्तौड़ दुर्ग की वह महारानी, रति से सुंदर दिखती थीं।
उर्वशी, रम्भा सी परियां, नहीं एक पल टिकती थीं।
कामदेव भी जिसे देखकर, विचलित सा हो जाता था।
अलाउद्दीन खिलजी उसको ही, हुरम बनाना चाहता था।
पर वो राजपूत की बेटी, प्रण की बड़ी पुजारी थी।
पति के सिवा उसे दुनिया में, कोई चीज न प्यारी थी।
खिलजी की तो उस पदमण पर, परछाई भी नहीं पड़ी।
लाज बचाने के खातिर वो, अग्निकुंड में कूद पड़ी।
मर के अमर हुई महारानी, तीर्थ बनी चित्तौड़ धरा।
उज्ज्वल क्षत्री वंश हुआ और राजस्थानी वसुंधरा।
उसको कामी खिलजी की ये, आज प्रेमिका कहते हैं।
हैरत है ये अर्थपुजारी, इस भारत में रहते हैं।
जिनका धर्म इमां पैसा है, वे क्या जाने मर्यादा।
पैसा लेकर जहां प्यार को, कर लेते आधा आधा।
राजस्थानी कुल-कानी को, समझे ऐसी सोच कहाँ।
प्रगतिवाद के इन पुतलों में, मानवता का लोच कहाँ।
गर इतिहास हुआ खंडित तो, पीछे कुछ ना बच पाएगा।
संस्कृति का अमृत निर्झर, जहर सना हो जाएगा।
हर गौरव की थाती को ये, मनोविनोदी ले लेंगे।
और उसे विकृत कर करके, फिल्मकहानी गढ़ लेंगे।
अब पानी सर पर है आया, उठ पतवार संभालो तुम।
डूब न जाए अर्थ-समंद में, ये इतिहास बचालो तुम।
मेरे भारत के युवाओ! इक रानी की बात नहीं।
पद्मिनी हो या जोधा को, फिल्माने की बात नहीं।
बात सिर्फ है स्वाभिमान की, सत्य सनातन वो ज्योती।
उसपे घात करे कोई तो, हमसे सहन नहीं होती।
शौर्य , त्याग और पवित्रता का स्वरूप महारानी पद्मावती अमर रहें ..

साभार: मनीषा सिंह बाईसा, https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=1901190406869466&id=100009355754237

खंडन, वैश्या_के_यहां_की_मिट्टी_का_माँ_दुर्गा_की_मूर्ति_बनाने_में_प्रयोग

#खण्डन --- - #वैश्या_के_यहां_की_मिट्टी_का_माँ_दुर्गा_की_मूर्ति_बनाने_में_प्रयोग - कई दिनों से एक अमर्यादित पोस्ट देखने को मिल रही थी जिसमे...